कैसे एक 5 वर्ष का बालक जीवित ही पहुंच गया यम के द्वार

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पिता की आज्ञा मानकर चौदह वर्ष वन में बिताने वाले प्रभु श्री राम के बारे में तो सब जानते है। लेकिन क्या आप पिता की आज्ञा मानकर यमलोक जाने वाले एक बालक के बारे में जानते है? हाँ बालक, वो भी केवल 5 वर्ष का। आज हिन्दूबुक के पन्नो से हम आपके लिए लेकर आए है “कठोपनिषद” में वर्णित बालक “नचिकेता” की कथा, जो अपने पिता की आज्ञा मानकर यमलोक चले गए थे:

लम्बे लम्बे डग भरता हुआ बालक नचिकेता तेजी से चला जा रहा था। सांसे धौकनी की तरह चल रही थी, माथे से पसीना टपक रहा था किंतु चेहरे पर मुस्कान थी। भूख प्यास की तो उसे परवाह ही नही थी। उसे तो संध्या से पूर्व ही यमपुरी पहुँचना था। अब तो संध्या भी होने आई थी, पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। नचिकेता की चाल और तेज हो गई। सूर्यदेव का रथ अपनी गति से दौड़ रहा था, और उसी गति से नचिकेता का हृदय भी भाग रहा था। संध्या हो गई थी, सूर्यनारायण अपने लोक में लौट चुके थे, भागते दौड़ते नचिकेता भी यमपुरी के द्वार पर आ पहुंचा था। बालक का हृदय बेहिसाब धड़क रहा था, भागती हुई सांसों को नियंत्रण में लाकर नचिकेता ने हाँफते हुए यमलोक के द्वारपालों से कहा, “मुझे यमराज से मिलना है, कृपया द्वार खोल कर मुझे प्रवेश की आज्ञा दे”।
अब चौंकने की बारी द्वारपालों की थी। वे असमंजस में पड़ गए कि ये नन्हा सा बालक कौन है, जो सशरीर ही यमलोक तक आ पहुंचा है। आपस मे विचार करके उन्होंने बालक से ही पूछ, “बालक! तुम कौन हो? तुम्हारा परिचय क्या है? और तुम यमपुरी क्यो आए हो?

नचिकेता ने बड़ी ही विनम्रता से हाथ जोड़ कर जवाब दिया – “हे यमपुरी के रक्षकों! मेरा नाम नचिकेता है, मैं वाजश्रवा ऋषि का पुत्र हूँ। मेरे पिता ने मुझे यमराज को दान कर दिया है, अतः मैं पिता का वचन पूर्ण करने स्वयं को यमराज को समर्पित करने आया हूँ, अतः आप लोग मुझ पर कृपा कर मुझे यमराज से मिलने की आज्ञा दे।

बालक का जवाब सुनकर द्वारपाल अचंभित रह गए। बालक की विनम्रता ने उन्हें सम्मोहित कर लिया। उन्होंने बालक नचिकेता पर स्नेहदृषि डालते हुए कहा- अरे नन्हे बालक! ये यमपुरी है। यहाँ कोई भी जीव जीवित प्रवेश नही कर सकता, इसीलिए तुम घर को लौट जाओ। किन्तु बालक नचिकेता का निश्चय तो दृढ़ था, वह द्वारपालों से हठ करने लगा। थक हार कर द्वारपालों ने कहा कि अभी यमराज यमपुरी में नही है। बालक नचिकेता ने कहा, कोई बात नही। उनके लौटने तक मैं यहीं प्रतीक्षा करूँगा, और इतना कहकर नचिकेता वहीं द्वार पर ही पद्मासन लगा कर बैठ गया। वातावरण में एक अनोखी शीतलता थी। ठंडी हवाएं बह रही थी, नचिकेता की थकान उतरने लगी। अब उसे एक दिन पूर्व के सारे घटनाक्रम स्मरण होने लगे।

वाजश्रवा ऋषि का आश्रम, मंत्रोच्चार की ध्वनि और यज्ञ का धुआं समस्त वातावरण को पवित्र कर रहा था। दूर दूर से देश देश के ब्राह्मण और निर्धन इकठ्ठा हुए थे, होते भी क्यो नही। वाजश्रवा जी ने स्वर्ग के सुख की कामना से “विश्वजीत” यज्ञ का आयोजन जो किया था साथ ही यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में अपनी समस्त धन सम्पदा “दान” कर देने का निश्चय किया था। किन्तु जब दान देने की बारी आई तब बालक नचिकेता ने देखा कि पिताजी बूढ़ी हो चुकी गायों को दान कर रहे है। पिताजी मोह में फँस गए है यह देखकर नचिकेता को अच्छा नही लगा। वह पिताजी के पास गया और कहने लगा कि पिताजी यह आप क्या कर रहे है। जो वस्तुएं आप पर बोझ बन गई है आप उन्ही का दान कर रहे है, यह तो गलत है। पिताजी ने बालक को हड़का दिया। तब नचिकेता कहने लगा, “पिताजी मैं भी तो आपकी सम्पत्ति हूँ, बताइये आप मुझे किसे दान देंगे? पिताजी ने कहा, बेटा यह तुम्हारे समझ के बाहर की बाते है तुम जाओ अन्य बालको के साथ खेलों। किन्तु नचिकेता तो हठी था, वह बार बार अपने पिता से पूछने लगा, बताइये न पिताजी आप मुझे किसे दान देंगे? पिताजी ने झल्लाकर कहा- जा, तुझे मैं यमराज को दान करता हूं। बालक नचिकेता ने मुस्कुरा कर पिताजी को प्रणाम किया और यमलोक की ओर प्रस्थान कर गया।

यमपुरी के द्वार पर प्रतीक्षा करते हुए बालक नचिकेता को तीन दिन हो गए थे। इन तीन दिनों में उसने न कुछ खाया था न पिया था। तीन दिन बाद यमराज लौट कर आए तो द्वार पर एक बालक को बैठा देखा। द्वारपालों से पूरे मामले की जानकारी लेकर यमराज ने नचिकेता को अपने महल में बुलवाया और नचिकेता से कहने लगे- नन्हे बालक! मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूँ। तुम्हारे पिताजी ने क्रोधवश तुम्हे मुझे दान कर दिया है, लेकिन उन्हें अपनी वाणी पर पश्चाताप है और वो तुम्हारे लिए परेशान है। मैं तुम्हे उनके पास वापस भेज दूँगा किन्तु इतनी कम उम्र में तुम्हारा यह दृढ़ निश्चय देखकर मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग लो। नचिकेता ने पहले वरदान के लिए यमराज से कहा, मेरे पिताजी को स्वर्ग के सुखों की कामना है अतः आप उन्हें वे सारे सुख प्रदान करें। यमराज ने कहा ‘तथास्तु’। दूसरे वरदान के रूप में नचिकेता ने कहा- मैं संसार के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहता हूँ। मनुष्य जीवन के लक्ष्य को जानना चाहता हूँ। यमराज ने नचिकेता को संसार का समस्त ज्ञान प्रदान कर दिया। अपने तीसरे वरदान में नचिकेता में यमराज से “मृत्यु” के रहस्य को जानना चाहा। यह सुनकर यमराज गम्भीर हो गए। यमराज ने कहा, तुम अभी बहोत छोटे हो, और जो तुम जानना चाहते हो वो अत्यंत ही गूढ़ ज्ञान है। कई ऋषि मुनि हज़ारों वर्षों की तपस्या के बाद भी इस रहस्य को नही जान पाए है, यहाँ तक कि देवताओं के लिए भी यह रहस्य दुर्लभ है। तुम कुछ और मांग लो, चाहे तो अथाह धन संपदा राज्य सुख जो चाहे वो मांग लो किन्तु यह जिद छोड़ दो।

नचिकेता ने कहा- महाराज, आपने दूसरे वरदान के रूप में मुझे तो अद्भुत ज्ञान दिया है उसी में आपने मुझे बताया है कि संसार के समस्त सुख नश्वर है। तो अब मैं राज्य-सुख का क्या करूँगा। आप तो मुझे मेरे इसी प्रश्न का उत्तर दीजिए बस। यमराज कई दिनों तक नचिकेता को टालते रहे किन्तु उसकी जिद के आगे आखिर यमराज को हार माननी पड़ी। यमराज ने नचिकेता को ‘मृत्यु’ के रहस्य का दुर्लभ ज्ञान प्रदान किया। यम के द्वार पर नचिकेता को सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई, उसे अपने अस्तित्व के सारे सवालों के जवाब मिल गए, और उसने स्वयं को विलीन कर दिया।

कठोपनिषद के अतिरिक्त महाभारत के अनुशासन पर्व में भी नचिकेता की कथा का वर्णन है। नचिकेता को इस संसार का प्रथम जिज्ञासु माना जाता है, उसे हमेशा एक आदर्श की तरह प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन आज बहुत कम लोग नचिकेता के बारे में जानते है। हिन्दूबुक के माध्यम से हमारा यही प्रयास है कि आपको हिन्दू धर्मशास्त्रों में वर्णित कथा-प्रसंगों से अवगत कराते रहे।

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