भगवान गणेश ने कैसे तोड़ा कुबेर का घमण्ड, पढ़िए ये कथा

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सनातन भारतीय धर्मग्रंथों में कुबेर का स्थान धन के देवता के रूप में है, पर वास्तव में वह देवता ना होकर गंधर्व है। सृष्टि के संचालन हेतु देवमण्डल में सभी देवताओं को कोई न कोई जिम्मेदारी दी गई है, इसी क्रम में कुबेर को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। माना जाता है कि कुबेर के पास संसार का सारा स्वर्ण भंडार है। रामायण में वर्णित स्वर्ण निर्मित लंका नगरी रावण की नही थी अपितु इस सोने की लंका का निर्माण कुबेर ने करवाया था। रावण कुबेर का सौतेला भाई था और अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर उसने कुबेर से सोने की लंका छीन ली थी।

शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होने के बाद अहंकार होना स्वाभाविक है, इससे देवता भी नही बच सके तो आम मनुष्य की क्या बिसात? एक बार कुबेर को भी स्वयं के कोषाध्यक्ष होने पर घमंड हो गया था। बात उस समय की है जब कुबेर के पास स्वर्ण का अक्षत भंडार हो चुका था। अपने स्वर्ण भंडार से गदगद कुबेर ने सोने की लंका का निर्माण करवाया।

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जैसा कि स्वाभाविक है, सोने की लंका बनवाने के बाद अहंकारवश अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने के लिए कुबेर का मन मचलने लगा। उन्होंने अपने वैभव का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन किया, जिसमें देवता भी शामिल हुए। चारों ओर कुबेर की धन, संपदा और ऐश्वर्य के चर्चे होने लगे। इसके बाद भी उसका गर्वित मन संतुष्ट नहीं हुआ, तो उसने सोचा कि स्वयं परमात्मा को आमंत्रित कर अपने वैभव से चमत्कृत किया जाए।

सभी देवताओ को आमंत्रित कर कुबेर भगवान शिव को आमंत्रित करने कैलाश पर्वत पहुंचे। मार्ग में भोले भंडारी भगवान शिव को याद कर कुबेर के अहंकारित मन ने विचार किया कि एक व्याघ्रचर्म धारण करने वाले, खुले पहाड़ों में रहने वाले शिव शंकर जब उसकी लंका देखेंगे तो उनकी आंखें फटी रह जाएंगी। ऐसा सोचकर कुबेर तुरंत ही शिव जी को आमंत्रित करने चल पड़े।

कुबेर जब शिव जी को आमंत्रित करने कैलाश पर्वत पहुंचे, तब भगवान ध्यान में थे। कुबेर उनके जागने की प्रतीक्षा करने लगे। शिव जी जब ध्यान से उठे, तो कुबेर को देखते ही उनके मन का भाव जान गए और उनकी नादानी पर मुस्कुरा उठे। कुबेर यह ना जान सके कि जिसे कण-कण का भान है, वह उनका भी मन पढ़ सकता है।

उन्होंने शिव जी से कहा- “हे देवों के देव महादेव, मैंने एक छोटा सा घर बनवाया है और मेरी इच्छा है कि आप मेरे घर को अपनी चरणधूलि से पवित्र करें। मैं एक भव्य भोज का आयोजन करने जा रहा हूं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि उसमें सभी देवगण, गंधर्व, यक्ष आदि भाग लें और सभी भोजन पाकर तृप्त होकर लौटें। हे महादेव कृपया आप भी सहपरिवार पधारें।”

भगवान शिव की समझ में आ गया कि कुबेर अहंकारग्रस्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा, “मैं और पार्वती तो नहीं आ पायेंगे किंतु गणेश जी को अवश्य भेज देंगे। मेरा पुत्र गणेश अवश्य आपके निमंत्रण का मान रखेगा।”

गणेश जी उस समय किशोर अवस्था में थे। कुबेर ने सोचा कि पिता ना सही, बेटा ही सही। मेरा ऐश्वर्य देखकर अपने घर में कुछ तो चर्चा करेगा। इस प्रकार गणेश जी को भोजन का निमंत्रण देकर वह लंका नगरी लौट आए।

नियत समय पर गणेश जी अपने वाहन मूषक पर विराजमान होकर कुबेर के यहां उपस्थित हो गए। कुबेर ने उनका स्वागत कर कहा कि पहले चलकर मेरे द्वारा निर्मित स्वर्ण नगरी लंका की भव्यता का दर्शन कर लीजिए। गणेश जी ने कहा- “हे देव! मैं तो भोजन करने आया हूं, आपकी लंका देखने नही। आपकी धन संपत्ति और वैभव का दर्शन फिर किसी दिन कर लेंगे पहले आप भोजन लगवा दीजिए, मुझे भूख लगी है।”

मन मारकर कुबेर जी ने भोजन लगवा दिया, अपनी भव्यता दिखाने के लिए गणेश जी को सोने चांदी के बर्तनों में भोजन परोसा गया, लेकिन उन्हें गणेश जी की भूख का अंदाजा नहीं था। गणेश जी ने कुबेर के घर का सारा भोजन पलक झपकते ही चट कर दिया और अधिक मात्रा में भोजन लाने को कहा।

देखते ही देखते कई प्रकार के व्यंजन समाप्त होते चले गए, कुबेर का अन्न भंडार खाली हो रहा था। कुबेर जी चिंचित हो गए कि अगर गणेशजी ने ही सारा भोजन कर लिया तो अन्य देवता क्या खाएंगे। गणेश जी की क्षुधा तो समाप्त होने का नाम ही नही ले रही थी, अतृप्त रह जाने पर गणेशजी के कोप का भाजन बनना पड़ेगा। चिंचित कुबेर अपनी रक्षा के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे और भगवान शिव के सामने हाथ जोड़ कर विनती करने लगे।

तभी गणेश जी वहाँ आ गए और कहने लगे- “पिताश्री, आपने मुझे किस दरिद्र के यहाँ भोजन करने भेज दिया, उनके यहाँ तो मुझ अकेले का पेट भरने का भी सामर्थ्य नही है।” अपने लिए दरिद्र शब्द सुनकर कुबेर का सारा अहंकार मिट गया।

भगवान शिव ने कहा- “कुबेर, अपने ओछे अंहकार के प्रदर्शन करने के लिए ही तुम्हे लज्जित होना पड़ा। अहंकार विनाश का कारण है, अंहकार पतन का मार्ग है, इसिलये जीवन मे फिर कभी अहंकार न करना।”

 

वास्तविकता से परिचय होते ही कुबेर को समझ आ गया कि भगवान शिव ने उनका घमंड तोड़ने के लिए ही ये सारी माया रची है। उसने भगवान शिव और गणेश से अपने अहंकार का प्रदर्शन करने के लिए क्षमा मांगी, और भविष्य में कभी भी घमंड ना करने का संकल्प लिया।

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