क्या है अश्वत्थामा की लंबी आयु का रहस्य

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अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

सनातन मान्यतानुसार ऐसे आठ व्यक्तित्व हैं, जो चिरंजीवी हैं, और आज भी अदृश्य रूप में इस पृथ्वी पर निवास करते है। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। आज हम आपके लिए  चिरंजीवी “अश्वत्थामा” की कथा लेकर आए है :

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। एक बार गुरु द्रोण अपनी पत्नी संग भ्रमण करते हुए हिमालय (ऋषिकेश) पहुंचे, वहाँ तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा में तपेश्वर नामक स्वयंभू शिवलिंग है। यहाँ गुरु द्रोण और उनकी पत्नी माता कृपि ने भगवान शिव की तपस्या की। इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने इन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद माता कृपि ने एक तेजस्वी बाल़क को जन्म दिया। जन्म ग्रहण करते ही बालक के कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। भगवान शिव के प्रभाव से जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी, जो उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी।

एक शाप के कारण अश्वत्थामा को लम्बी आयु प्राप्त हुई और वे अष्ट चिरंजीवियों में सम्मिलित हुए। बाल्यकाल से ही अश्वत्थामा दुर्योधन का मित्र रहा। उनके पिता गुरु द्रोण ने उन्हें पांचाल राज्य के सिंहासन पर बिठाया था। अश्वत्थामा एक महान योद्धा था, उसे शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान था। उनके पिता गुरु द्रोण ने ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मशिर अस्त्र, दुर्लभ नारायण अस्त्र जैसे महाभयंकर अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान देकर युद्धकला में निपुण कर दिया था।

महाभारत युद्ध में उन्होंने घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा का वध किया था। उसके अतिरिक्त द्रुपदकुमार, शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु को भी मार डाला था। उन्होंने कुंतीभोज के दस पुत्रों का भी वध किया था। अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। किन्तु दुर्योधन से मित्रता के कारण वह सदैव ही अधर्म पथ पर चला। युद्ध समाप्ति के बाद क्रोध के आवेश में आकर अश्वत्थामा ने युद्ध के नियम विरुद्ध रात्रि के अंधेरे में पाण्डवो के शिविर में प्रविष्ट होकर पाण्डवो के पांच पुत्रो की निद्रावस्था में हत्या कर दी थी।

तत्पश्चात अर्जुन ने इन्हें बन्दी बना लिया व मृत्युदंड देने ही वाले थे कि द्रौपदी ने कहा कि- “एक तो ये ब्राह्मण है दूसरे ये आपके गुरु पुत्र भी है, गुरु के पुत्र में भी गुरु का ही अंश होता है इसीलिए ये मृत्युदंड के अधिकारी नही है।” लेकिन अर्जुन उसे मारने की प्रतिज्ञा ले चुका था। अश्वत्थामा को दंड भी मिले और अर्जुन की प्रतिज्ञा भी भंग न हो इसीलिए तब पाण्डवो ने भगवान श्रीकृष्ण से परामर्श लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ” एक योद्धा को युद्धभूमि से अपमानित करके निष्कासित कर देना भी उसके लिए मृत्युदंड समान ही है।” तब भीम ने दण्डस्वरूप अश्वत्थामा के सर से उसकी चमत्कारी मणि निकाल कर उसे अपमानित कर छोड़ दिया। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को कल्पान्त तक पृथ्वी पर भटकते रहने का शाप दिया था, तभी से अश्वत्थामा अपनी मुक्ति के लिए इस पृथ्वी पर भटक रहे है।

यदा कदा उन्हें कई जगहों पर देखे जाने के किस्से सुनाई पड़ते है।

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