सोमवार व्रत कथा

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हिन्दुबुक के पन्नो से आज हम अपने पाठकों के लिए लेकर आ रहे है सोमवार व्रत का सम्पूर्ण महात्म्य। भारतीय परंपरा और हिंदू धर्म में तीज-त्योहारों का अपना ही विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी इष्टदेव का पुजन किया जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सोमवार को भगवान शिव का दिन कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का प्रावधान है। नाथों के नाथ भोलेनाथ को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए सोमवार का दिन सबसे उपयुक्त होता है। सोमवार के दिन विधि पूर्वक पूजन-अर्चन करने से भगवान शंकर अपने भक्तों की मनोकामना जल्द पूर्ण कर देते हैं। महादेव का एक नाम “आशुतोष” भी है जिसका अर्थ होता है जल्द प्रसन्न होने वाले। सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से की गई पूजा अर्चना से भगवान शिव जल्द प्रसन्न होते है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते है।

मुख्यतः 3 प्रकार से शिवजी के लिए व्रत किया जाता है। आमतौर पर शिवभक्त प्रति सोमवार व्रत, प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार व्रत रखते हैं। इन सभी व्रत से भोले भंडारी जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। इन सभी व्रतों में शिवजी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है और व्रतकथा पढ़ी और सुनी जाती है। इस पोस्ट में हम आपके लिए प्रति सोमवार को किए जाने वाले व्रत की पूजन विधि और व्रत की कथा लेकर आए है।

सोमवार व्रत की विधि :

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ज्यादा तामझाम की आवश्यकता नही होती है। आप अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार भोलेनाथ का पूजन अर्चन कर सकते है इसके लिए किसी विशेष विधि की आवश्यकता नही है। सोमवार व्रत में व्यक्ति को प्रातः स्नान करके शिव जी को जल और बेल पत्र चढ़ाना चाहिए तथा शिव-गौरी की पूजा करनी चाहिए। शिव पूजन के बाद सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए, फिर शिव जी की आरती कर, भोलेनाथ को प्रसाद अर्पण कर प्रसाद बांटना चाहिए। इसके बाद केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए। सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है प्रति सोमवार व्रत, प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत. इन सभी व्रतों के लिए एक ही विधि होती है, लेकिन व्रत की कथाएँ अलग अलग है। व्रत की कथा पढ़े-सुने बिना व्रत अधूरा होता है।

सोमवार व्रत की कथा :

प्राचीनकाल की बात है एक गाँव में एक साहूकार रहता था। साहूकार धनी था उसके पास अथाह धन-दौलत थी लेकिन उसके धन का कोई उत्तराधिकारी कोई नही था अर्थात उसके कोई संतान नहीं थी। साहूकार अपने वंश को लेकर सदैव चिंतित रहता था। साहूकार भगवान शिव का परम भक्त था तथा पुत्र प्राप्ति की कामना में वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रति सोमवार को व्रत रखता था और व्रत के दौरान वह विधिपूर्वक शिव-पार्वती की पूजा और शाम को शिवलिंग पर दीपक जलाता था। साहूकार की पूजा-अर्चना को देखकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभु, ये साहूकार आपका परमभक्त है, प्रति सोमवार को विधि विधान से आपकी पूजा करता है। मुझे लगता है कि आपको उसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए। शिवजी ने पार्वती की बात सुनकर कहा कि कि हे गौरी, ये संसार एक कर्मक्षेत्र है, जैसे एक किसान अपने खेत में बीज बोता है तो कुछ वक्त बाद उसे पेड़ मिलता है, उसी तरह इस संसार में आदमी जैसा कर्म करता है उसे उसका फल भी वैसा ही मिलता है। 

माता पार्वती के बार बार आग्रह करने पर शिवजी ने कहा कि देवी यह साहूकार धनवान तो है लेकिन इसके कोई पुत्र नहीं है इसलिए ये सैदव चिंतिंत रहता है। हालांकि इसके भाग्य में किसी संतान का योग नहीं है परंतु आपके आग्रह करने पर मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान तो देता हूं लेकिन इसका पुत्र अल्पायु होगा जो केवल 12 साल तक ही जीवित रहेगा। माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था। उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ दिनों बाद साहूकार की पत्नी गर्भवती हो गई और उसने एक सु्ंदर बालक को जन्म दिया। बालक के जन्म से घर पर हर्षोल्लास का माहौल था, लेकिन साहूकार खुश नहीं था। क्योंकि उसे पता था कि उसके बालक का जीवन केवल 12 वर्ष तक का ही है और उसने किसी को भी यह बात नहीं बताई थी।

जब साहूकार का बालक 11 वर्ष का हुआ तो उसने उसे शिक्षा प्राप्ति के लिए काशी भेजने का विचार किया। साहुकार ने बालक के मामा को बुलाया और उन्हें बहुत सारा धन देकर बालक के साथ काशी जाने का आदेश दिया। साहूकार ने मामा-भांजे से कहा कि वह काशी जाते समय रास्ते में यज्ञ करते हुए और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए जाएं। दोनों मामा-भांजे ने ऐसा ही किया। काशी जाते वक्त जिस रास्ते से मामा-भांजे गुजर रहे थे उसका राजा अपनी पुत्री का विवाह एक ऐसे राजकुमार से करवा रहा था जो काना था। दुल्हे का पिता इस बात से चिंतिंत था कि अगर दुल्हन पक्ष को पता चला गया तो राजकुमारी विवाह के लिए मना कर देगी।

साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया, उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा। लड़के के मामा से सारी बात तय कर लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया, लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था। उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी, उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा दिया कि “तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं।”

जब राजकुमारी ने यह बात पढ़ी तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इंकार कर दिया और अपने पिता से कहा कि ये मेरा पति नहीं है, मेरे पति शिक्षा ग्रहण करने काशी गए हैं। जब सब जगह यह बात फैल गई तो मजबूरी में दुल्हे के पिता ने सारी बात बता दी और दुल्हन के पिता ने बेटी को भेजने से इंकार कर दिया। इधर मामा-भांजे दोनों काशी पहुंच गए और बालक शिक्षा ग्रहण करने लगा और मामा ने यज्ञ करना शुरु कर दिया। जब साहूकार का पुत्र 12 साल का हो गया तो एक दिन उसने अपने मामा से कहा कि उसकी तबियत ठीक नहीं है इसीलिए वो अंदर सोने जा रहा है। साहूकार का पुत्र अंदर सोने चला गया और शिवजी के वरदानस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। कुछ देर बाद जब मामा अंदर पहुंचे तो उन्होंने बालक को मृत स्थिति में देखा और बहुत दुखी हुए परंतु वह रो नहीं सकते थे वरना यज्ञ उनका अधूरा रह जाता। इसलिए मामा वापस जाकर यज्ञ करने लगे और यज्ञ पूरा करने के बाद और ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद मामा अपने मृत भांजे को देखकर रोने लगे।

उसी वक्त उसी मार्ग से शिव-पार्वती गुजर रहे थे। माता पार्वती ने किसी के रोने की आवाज सुनी तो शिवजी से कहा कि हे प्रभु, कोई मनुष्य रो रहा है, चलो उसके दुख को दूर करते हैं। शिव-पार्वती मामा के पास गए और उन्होंने जब मृत बालक को देखा तो चकित हुए क्योंकि वह भगवान शिव के आशीर्वाद से जन्मा साहूकार का पुत्र था। माता पार्वती ने कहा कि हे नाथ ये तो साहूकार का पुत्र है जिसको आपने केवल 12 वर्षों का ही जीवन दिया था।

मृत बालक को देखकर माता पार्वती को दया आ गई और शिवजी से कहने लगी कि प्रभु, आप एक बार इस बाल को जीवन दान दे दीजिए वरना पुत्र की मृत्यु के शोक में इसके माता-पिता भी जीते जी मर जाएंगे। माता पार्वती के कई बार आग्रह करने पर शिवजी ने उनकी बात मान ली और उसे पुनः जीवनदान दे दिया। साहूकार का पुत्र जीवित हो गया और शिक्षा पूर्ण कर मामा-भांजे अपने घर की ओर प्रस्थान कर लिए। रास्ते में साहूकार का पुत्र उसी शहर से गुजरा जहां उसका विवाह हुआ था। दुल्हन के पिता ने बालक को पहचान लिया और मामा-भांजे को लेकर महल आ गए। दुल्हन के पिता ने एक समारोह किया और अपनी पुत्री को साहूकार के पुत्र के साथ भेज दिया।

जब साहूकार का बालक अपने घर पहुंचा तो उसके माता-पिता छत पर बैठे थे। वो सोच रहे थे कि अगर उनका पुत्र सही सलामत वापस नहीं लौटता है तो वे इसी छत से कूदकर जान दे देंगे। उसी समय मामा वहां आ गया और उसने बताया कि उनका पुत्र जीवित और विवाह करके और बहुत सा धन लेकर वापस लौटा है। अपने पुत्र के जीवित रहने का समाचार सुनकर माता पिता बड़े प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार के स्वप्न में आकर कहा- “हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है।”

इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

कथा पढ़ने के बाद भगवान शिव की आरती कर प्रसाद बाँटने से पूजा पूर्ण होती है।

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