शुक्रवार (संतोषी माता) व्रत कथा

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शुक्रवार के दिन माँ संतोषी की पूजा का विधान है। माना जाता है कि अगर कोई स्त्री माँ संतोषी की विधि विधान से पूजा करती है, शुक्रवार का व्रत रखकर कथा कहती सुनती है तो उसे जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है और उसके परिवार में सुख शांति बनी रहती है। संतोषी माता के व्रत में किसी विशेष विधि विधान की आवश्यकता नही होती बस एक बात का विशेष तौर पर ध्यान रखना होता है और वह यह है कि माँ संतोषी के व्रत में खटाई बिल्कुल भी नहीं खाई जाती है और न ही किसी को खट्टी चींजे बांटी जाती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि सप्ताह में एक दिन भोजन में खटास खत्म करके हम जीवन में और आपसी पारिवारिक रिश्तों में खटास कम करते है।

अगर आप भी माँ संतोषी का व्रत रखना चाहते है किन्तु इस व्रत की विधि और कथा के बारे में नहीं जानते है तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। हिन्दुबुक के पन्नो से आज हम आपके लिए लेकर आए है- माँ संतोषी के व्रत की कथा सम्पूर्ण विधि के साथ।

संतोषी माता (शुक्रवार) व्रत की विधि:

इस व्रत में प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर संतोषी माता को स्मरण कर दंडवत प्रणाम करें। पूजा करते समय जल से भरा कलश रखकर उसके उपर गुड़ और चने से भरा कटोरा रखें। पूजा शुरू करने से पहले माता से अपनी मनोकामना बताते हुए व्रत का संकल्प अवश्य लें, बिना संकल्प के पूजन अधूरा होता है। पूजन उपरांत माता के व्रत की कथा कहे या किसी से सुने। कथा कहने और सुनने वाले अपने हाथ में गुड़- चना अवश्य रखें और मन ही मन संतोषी माता का स्मरण करते रहे। पूजा के लिए गुड़- चना लेते समय सवाया का ध्यान रखें अर्थात अपने सामर्थ्य अनुसार चना- गुड़ सवा रुपए, सवा पांच रुपए या सवा ग्यारह रुपए के बढ़ते क्रम के अनुरूप ही लें। कथा समाप्त होने पर संतोषी माता की आरती करें। उसके बाद हाथ का गुड़ चना गौ माता को खिला दें और कलश पर रखा चना गुड़ प्रसाद के रूप में बांट दें और स्वयं भी प्रसाद लें। मनोकामना पूर्ण होने पर अपने सामर्थ्य अनुसार व्रत का उद्यापन करें।

संतोषी माता (शुक्रवार) व्रत की कथा :

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बुढ़िया थी जिसके सात बेटे थे। सातों भाइयों में सबसे छोटा भाई निठल्ला था जो कुछ भी काम नही करता था तो बाकि भाई बहुत ही काबिल व मेहनती थे। इसलिए बुढ़िया हमेशा अपने छोटे बेटे को बाकि 6 भाइयों का झूठा खिलाती थी। एक दिन छोटे बेटे की पत्नी ने कहा कि तुम्हारी मां तुम्हारे साथ बहुत भेदभाव करती है, अपने भाइयों का झूठन खिलाती है पर उसे यकीन नहीं हुआ। एक दिन सच जानने क लिए सिरदर्द का बहाना कर वह रसोई में ही चादर ओढ़कर लेट गया। माता हमेशा की तरह जब 6 भाइयों को खाना खिला चुकी तो सबकी झूठन से बचा खाना परोस कर छोटे बेटे को देने लगी। माता के इस कृत्य को देखकर उसने भोजन नहीं किया और घर छोड़कर परदेश जाने का निर्णय कर लिया। जब वह जाने को तैयार हुआ तो उसे अपनी पत्नी का ख्याल आया जो पशुओं के बाड़े में गोबर के उपले बना रही थी। उसने अपने जाने के बारे में बताते हुए उसे अपनी उंगली में पहनी हुई अंगूठी निशानी स्वरूप देकर कहा कि मैं काम करने परदेश जा रहा हूँ, यह अंगूठी तुम मेरी निशानी समझ कर रख लो, जब भी मेरी याद आए इस अंगूठी को देख लेना।

साथ ही उसने पत्नी से भी निशानी मांगी तो उसने कहा कि मेरे पास तो कुछ भी नहीं है, यह गोबर से सने हाथ हैं उनकी छाप ही साथ ले जाओं यह कहकर उसने अपने पति की पीठ पर गोबर से सने हाथों की छाप बना दी। अब पीठ पर पत्नी के हाथों से बनी गोबर की छाप लिए वह चल पड़ा और एक बड़े नगर में आ पहुंचा। अपनी हालत का जिक्र एक सेठ से किया और नौकरी मांगी, सेठ ने भी उसे काम पर रख लिया। बात पैसों की हुई तो सेठ ने कहा जैसा काम वैसे दाम। अब वक्त आदमी को होशियार बना ही देता है, धीरे – धीरे वह कामकाज में माहिर हो गया। सेठ के बाकि नौकर चाकर भी उसकी होशियारी के मुरीद होने लगे साथ उससे कई लोग जलने भी लगे। सेठ ने भी भांप लिया कि बंदा काम का है, तो धीरे-धीरे सेठ ने उसे अपना बहीखाता संभालने का जिम्मा दे दिया और उसकी ईमानदारी से खुश होकर एक समय बाद सेठ ने उसे मुनाफे का हिस्सेदार भी बना लिया।

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उधर उसकी पत्नी की दुर्दशा बहुत खराब हो रखी थी, उसकी सास, जेठानियों ने उसका जीना हराम कर रखा था। एक तो घर का सारा काम उससे करवाती ऊपर से खाने को घास-फूस की रोटी भी मिल जाती तो उसे भगवान की कृपा मान लेती। एक दिन वह पास के वन से लड़कियां लेने गई तो उसने देखा कि कुछ महिलाएँ वहाँ कथा कह रही हैं। जब उसने महिलाओं से पूछा कि यह व्रत कथा किसकी है तो उन्होंने बताया कि संतोषी माता की व्रत कथा कह रही हैं। उसने पूछा कि उसे भी इस व्रत की विधि बताएं। महिलाओं ने उसे संतोषी माता के व्रत की विधि बता दी। घर लौटते समय उसे रास्ते में एक मंदिर दिखाई दिया, वह माता के चरणों में लेट गई और कहने लगी कि हे मां! मैं क्या करूं, मेरा कल्याण करो मां। मां ने भी उसकी पुकार सुनी।

 

वह लकड़ियों को बेचकर प्रसाद के लिए गुड़ चना ले आई और शुक्रवार का उपवास किया व व्रतकथा भी सुनी। कुछ ही दिनों में उसे पति की चिट्ठी मिली साथ ही पैसे भी आने लगे। अब वह हर शुक्रवार को उपवास करने लगी। एक दिन उसने माँ से गुहार लगाई कि हे माँ, मुझे रुपए पैसे नही चाहिए, मुझे तो बस मेरे स्वामी से मिला दो। तब स्वयं संतोषी माता एक वृद्धा का भेष धारण कर उसके पति के पास पहुंची और उसे पूछा कि उसका कोई घरबार है या नहीं। उसने बताया कि सब कुछ है लेकिन इस काम को छोड़कर कैसे जाऊं? तब वृद्धा ने कहा कि तुम मां संतोषी के नाम का दिया जलाकर कल सुबह दुकान पर बैठना शाम तक तुम्हारा सारा हिसाब-किताब हो जाएगा और सामान भी बिक जाएगा। उसने ऐसा ही किया माता के वरदान से वह शाम के समय कपड़े गहने खरीदकर अपने गांव चल दिया।

उधर उसकी पत्नी नित्य की तरह माता के मंदिर में माता से बातें कर रही थी, ” हे मां, मेरे स्वामी कब आएंगे? तो उसने कहा बेटी तुम्हारे पास जो लकड़ियां हैं इनकी तीन गठरियां बना लो। एक को नदी किनारे छोड़ दो, एक को यहां मंदिर में और एक को अपने घर जाकर पटककर कहना कि लो सासु माँ लकड़ियां लो और भूसे की रोटी दो। माता के कहने पर उसने वैसा ही किया। उधर से जब उसका पति लौट रहा था तो नदी पार करते ही उसे सूखी लकड़ियां दिखाई थी। लम्बे सफर से उसे थकान हो गई थी और भूख भी लग आयी थी। उन लकड़ियों से उसने आग जलाई और भोजन का प्रबंध किया और खा-पीकर घर की ओर रवाना हुआ। जब वह घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी ने लकड़ियों का गट्ठर आंगन में पटकर कहा कि “लो सासूजी लकड़ियों का गठ्ठर लो और भूसे की रोटी दो।” अपनी पत्नी की ऐसी हालत देखकर उसे बहुत दुख हुआ।

उसने अपनी मां से पूछा कि इसकी ऐसी हालात क्यों हुई तो मां ने कहा कि तेरी पत्नी कामधाम तो कुछ करती नहीं, गाँव भर में भटकती रहती है। पर वह अपने साथ हुए अन्याय को भी भूला नही था सो उसने अपनी माँ से दूसरे घर की चाभी मांगी और अलग रहने लगा। अब तो मां संतोषी की कृपा से उसके दिन बहुर गए। फिर वह शुक्रवार भी आया जिसमें माता का उद्यापन करना था। उसने पूरी तैयारी कर ली और अपनी जेठानी के बच्चों को बुलाया, लेकिन जेठानी ने अपने बच्चों को पूरी तरह सीख देकर भेजा कि भोजन के समय खटाई मांगना। अब बच्चे भोजन के बाद खट्टी चीज के लिए जिद करने लगे तो उसने मना कर दिया। बच्चों ने कहा खट्टा नही देती तो पैसे दे दो। उसने बच्चो को पैसे दे दिए। उन्हीं पैसों से बच्चों ने खट्टी चीज खरीद कर खा लिया। इस प्रकार व्रत का उद्यापन पूरा नहीं हो पाया और मां संतोषी रुष्ट हो गई।

परिणामस्वरूप बहु के पति को राजा के सैनिक पकड़कर ले गए। जेठ-जेठानी फिर से ताने मारने लगे, लोगों को लूट-लूटकर धन इकट्ठा कर लिया, अब जेल में सड़ेगा तो पता चलेगा। बहु से यह सब सहन नहीं हुआ और मां के चरणों में जा पहुंची और कहने लगी- “माँ मुझे और मेरे पति को किस बात की सजा दे रही हो?” माता कहने लगी बेटी तूने उद्यापन पूरा नहीं किया इस वजह से तुम्हें यह सब सहन करना पड़ रहा है। अब दोबारा उद्यापन करों और इस बार कोई गलती मत करना। बहु का पति वापस लौट आया और अगले शुक्रवार को विधिपूर्वक फिर से उद्यापन किया और इस बार कोई भी भूल नहीं की और ब्राह्मण के लड़के को बुलाकर व्रत का उद्यापन किया। इस बार पैसों की जगह फल दिए और उसका उद्यापन पूरा हुआ। मां संतोषी की कृपा से जल्द ही बहू ने एक सुंदर से पुत्र को जन्म दिया और बहु को देखकर पूरे परिवार ने संतोषी माता का विधिवत पूजन करना शुरू कर दिया और उनका परिवार सुख से जीवन बिताने लगा।

।। अथ श्री संतोषी माता व्रत कथा ।।

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