जब श्रीराम ने तोड़ा हनुमानजी का अहंकार

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अधर्म के विनाश के लिए अयोध्यानरेश भगवान श्रीराम के नेतृत्व में किष्किंधा का वानर दल विश्व की सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली दैत्यशक्ति से युद्ध कर रहा था। एक ओर महाराज सुग्रीव की वानर सेना थी, दूसरी ओर लंकाधिपति रावण का असुर दल। रावण के सबसे शक्तिशाली पुत्र मेघनाद और राम के छोटे भाई लक्ष्मण के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था। जब मेघनाद अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर भी लक्ष्मण को परास्त नही कर पाया, तब उसने आसुरी माया का सहारा लिया। वह अपने रथ को आकाश में ले गया और अदृश्य होकर लक्ष्मण से युद्ध करने लगा। अदृश्य होकर युद्ध करने पर भी जब मेघनाद के सारे अस्त्र लक्ष्मण का कुछ न बिगाड़ पाए तब अंत मे मेघनाद ने अपने सबसे शक्तिशाली और अमोघ अस्त्र “शक्ति अस्त्र” का आव्हान किया और लक्ष्मण पर चला दिया। विश्व मे किसी के भी पास “शक्ति अस्त्र” का कोई तोड़ नही था, इसीलिए वह अमोघ अस्त्र था। लक्ष्मण ने अपने बचाव के तमाम उपाय कर लिए लेकिन वह शक्ति अस्त्र को रोक नही पाए और शक्ति अस्त्र ने लक्ष्मण की कमर में प्रहार कर दिया जिससे लक्ष्मण युद्धभूमि में ही मूर्छित हो गए। तब विभीषण के परामर्श पर हनुमानजी ने लंका में प्रवेश कर सुषेण वैद्य को उठाकर वानर सेना के शिविर में ले आए।

सुषेण वैद्य ने लक्ष्मण की नाड़ी जांच कर कहा कि यदि सूर्योदय से पूर्व मृत संजीवनी बूटी मिल जाए तो लक्ष्मण के प्राण बच सकते है अन्यथा नही। हनुमानजी मृत संजीवनी बूटी लाने चल दिए। हिमालय पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि वहाँ कई दिव्य जड़ी बूटियां पर्वत को सुशोभित कर रही थी। हनुमानजी को मृत संजीवनी बूटी की पहचान नही थी इसीलिए वे पूरा पर्वत ही उठाकर चल दिए।

वापसी के मार्ग में जब वे अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तब महाराज भरत ने उन्हें देखा। भरत ने सोचा कि ये कोई असुर है जो पर्वत को अवध प्रदेश के किसी नगर में गिराकर नगरवासियों की हत्या करना चाहता है। भरत ने हनुमानजी पर बाण चला दिया। हनुमान जी मूर्छित होकर पर्वत सहित धरती पर आ गिरे। हनुमानजी की चेतना वापस आते ही उन्होंने महाराज भरत को देखा और उन्हें सारी बात बता कर सभी परिस्थितियों से अवगत कराया और उनसे ये कहते हुए विदा मांगी की यदि सूर्योदय से पूर्व मैं वहाँ नही पहुंचा तो अनर्थ हो जाएगा।

तब महाराज भरत ने हनुमानजी से कहा- “आप चिंता न करे हनुमान। मैं अभी अपने धनुष से एक बाण का सन्धान करता हूं, आप पर्वत सहित उस बाण पर विराजमान हो जाइए, यह बाण तीव्र गति से आपको लंका के वानर शिविर तक पहुंचा देगा”। हनुमानजी ने कहा- “भैया भरत! मेरा इतना विशाल आकार, और साथ मे इतना बड़ा पर्वत! आपका ये छोटा सा बाण हम दोनों का भार कैसे सहन कर पाएगा? तब महाराज भरत ने अपने एक हाथ से ही हनुमानजी को पर्वत सहित उठाकर अपने बाण पर बिठा दिया था। हनुमान जी का अहंकार मिट गया, इन्हें अपने कहे वचनों पर बड़ी लज्जा आई और वे पर्वत से उतरकर महाराज भरत से अपने कहे वचनों के लिए क्षमा मांगकर कहने लगे- “सांसारिक माया के वशीभूत होकर मैने कुछ क्षणों के लिए अपने बल पर अहंकार कर लिया था, इसीलिए प्रभु ने ही अपनी लीला द्वारा मेरे अहंकार का नाश किया है। आपको मेरे लिए बाण सन्धान करने की आवश्यकता नही है, प्रभु श्रीराम की कृपा से मेरे सारे काम स्वयं ही सिद्ध हो जाते है। उनकी ही कृपा से मैं सूर्योदय के पूर्व ही वहाँ पहुँच जाऊँगा”। इतना कहकर हनुमानजी ने महाराज भरत को प्रणाम किया और संजीवनी बूटी का पर्वत लेकर लंका की ओर प्रस्थान कर गए।

हनुमानजी स्वयं महादेव के रुद्रावतार थे, उन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी इसीलिए उन्हें “जितेन्द्रिय” भी कहा जाता है। लेकिन भगवान भी जब अवतार लेकर जब धरती पर आते है तो श्रीहरि विष्णु की माया कभी न कभी उन्हें भी अपने प्रभाव में ले ही लेती है, जैसे हनुमानजी को ले लिया और कुछ क्षणों के लिए उन्हें अपने बल पर अहंकार हो गया था। लेकिन जो प्रभु के भक्त है, निस्वार्थ भाव से प्रभु की भक्ति करते है, प्रभु उनका पतन नही होने देते। भक्त अगर माया के प्रभाव में आ भी जाए तब भी भगवान उन्हें इसका अहसान करा कर सम्भाल लेते है, जैसे हनुमानजी को संभाल लिया।

यह कथा रामायण में वर्णित नही है, श्रुतियों द्वारा इसका वर्णन मिलता है । समाज को अहंकार से दूर रहने के की शिक्षा देने के लिए यह कथा सुनाई जाती रही है।

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