श्री मयूरेश स्तोत्रमं पाठ (हिंदी भावार्थ सहित)

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भगवान शिव के पुत्र गणेशजी का “मयूरेश स्तोत्र” तुरंत असरकारी माना गया है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक अथवा शारीरिक रूप से परेशान है, अथवा किसी प्रकार की बीमारी से दुखी है तब इस स्तोत्र का पाठ करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इसका पाठ किसी भी चतुर्थी पर फलदायी है लेकिन अंगारक चतुर्थी पर इसे पढ़ने से फल सहस्त्र गुना बढ़ जाता है। राजा इंद्र ने मयूरेश स्तोत्र से ही गणेशजी को प्रसन्न कर विघ्नों पर विजय प्राप्त की थी।

इस स्तोत्र का पाठ स्त्री एवं पुरुष सामान रूप से कर सकते हैं। हमारे जीवन का प्रत्येक दिन गुरु स्तवन और मयूरेश स्तोत्रम् से हो तो जीवन में गणपति महाराज कोई विघ्न नही आने देते। इसके अतिरिक्त अगर किसी के मिथ्यारोप में जेल हो गई हो या जाने की सम्भावना बन रही हो तो विधिविधान पूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें तो संकट टल जाता है।

पाठ की विधि:

मयूरेश स्तोत्र का पाठ वैसे तो गणेश चतुर्थी से आरम्भ करना शुभ माना जाता है किंतु आप शुक्लपक्ष की किसी भी चतुर्थी या बुधवार से इस स्तोत्र का पाठ आरम्भ कर सकते है, उसके बाद नित्यप्रति इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। पूजन करते समय सबसे पहले गणपति जी का विधिवत मंत्रोच्चार द्वारा आव्हान-ध्यान करें, उसके बाद यथाशक्ति गणपति जी का पंचोपचार या शोषडापचार पूजन करें और उसके बाद स्तोत्रपाठ आरम्भ करें।

।। अथ श्रीमयूरेश स्तोत्रमं ।।

॥ ब्रह्मोवाच ॥

ॐ पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।
मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥१॥

परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदिस्थितम् ।
गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥२॥

सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया ।
सर्व विघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥३॥

नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् ।
नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥४॥

इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टतमहर्निशम् ।
सदसद्वयक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥५॥

सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् ।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥६॥

पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥७॥

मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् ।
समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥८॥

सर्वज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥९॥

अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् ।
अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥१०॥

फलश्रुति

॥ मयूरेश उवाच ॥

इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् ।
सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥११॥

कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् ।
आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥१२॥

॥ इति श्री मयूरेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

हिंदी भाावार्थ :

।। अथ श्रीमयूरेश स्तोत्रमं ।।

।। ब्रह्मा जी बोले ।।

जो पुराण पुरुष हैं और प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकार की क्रिडाएँ करते हैं, जो माया के स्वामी हैं तथा जिनका स्वरूप दुर्विभाज्य अर्थात अचिन्त्य है, उन मयूरेश गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ
।। १ ।।

जो परात्पर, चिदानन्दमय, निर्विकार, सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित, गुणातीत एवं गुणमय हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ ।। २ ।।

जो स्वेच्छा से ही संसार की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन सर्वविघ्नहारी देवता मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ।। ३ ।।

जो अनेकानेक दैत्यों के प्राणनाशक हैं और नाना प्रकार के रूप धारण करते हैं, उन नाना अस्त्र-शस्त्रधारी मयूरेश को मैं भक्ति भाव से नमस्कार करता हूँ ।। ४ ।।

इन्द्र आदि देवताओं का समुदाय दिन-रात जिनका स्तवन करता है तथा जो सत्, असत्, व्यक्त और अव्यक्त रूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ।। ५ ।।

जो सर्वशक्तिमय, सर्वरूपधारी, सर्वव्यापक और सम्पूर्ण विद्याओं के प्रवक्ता हैं, उन भगवान मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ।। ६ ।।

जो पार्वती जी को पुत्र रूप से आनन्द प्रदान करते और भगवान शंकर का भी आनन्द बढ़ाते हैं, उन भक्तानन्दवर्धन मयूरेश को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ।। ७ ।।

मुनि जिनका ध्यान करते हैं, मुनि जिनके गुण गाते हैं तथा जो मुनियों की कामना पूर्ण करते हैं, उन आप समिष्ट-व्यष्टि रूप मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ।। ८ ।।

जो समस्त वस्तुविषयक अज्ञान के निवारक, सम्पूर्ण ज्ञान के उद्भावक, पवित्र, सत्य-ज्ञान स्वरूप तथा सत्यनामधारी हैं, उन मयूरेश को मैं नमस्कार करता हूँ ।। ९ ।।

जो अनेक कोटि ब्रह्माण्ड के नायक, जगदीश्वर, अनन्त वैभवसम्पन्न तथा सर्वव्यापी विष्णु रूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ।।१० ।।

फलश्रुति

।। मयूरेश बोले ।।

यह स्तोत्र ब्रह्मभाव की प्राप्ति कराने वाला और समस्त पापों का नाशक है, मनुष्यों को सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु देने वाला तथा सारे उपद्रवों का शमन करने वाला है ।। ११ ।।

सात दिन तक इसका पाठ किया जाए तो कारागार में पड़े हुए मनुष्यों को भी यह छुड़ा लाता है. यह शुभ स्तोत्र आधि अर्थात मानसिक चिन्ता तथा व्याधि अर्थात शारीरिक रोग को भी हर लेता है और भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है ।।१२ ।।

॥ इति श्री मयूरेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

 

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