क्यो करते है शिवलिंग की आधी परिक्रमा, क्या है इसका शास्त्रीय विधान

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सनातन हिन्दू धर्म मे देवताओं की “परिक्रमा” का बड़ा महत्व है। परिक्रमा का अर्थ है किसी स्थान, व्यक्ति या किसी मूर्ति के चारो ओर चक्कर काटना। इसको “प्रदक्षिणा” करना भी कहते है। परिक्रमा या प्रदक्षिणा करना षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा का अर्थ होता है कि- जिसकी आप प्रदक्षिणा कर रहे हो उसके दाँए ओर से गति करना। प्रदक्षिणा में व्यक्ति का दाहिना अंग ‘जिस की परिक्रमा कर रहे हो’ उसकी ओर होता है। जिस भी देवता की आप पूजा कर रहे है, उस देवता को उद्देश्य करके उसके दक्षिणावर्त भ्रमण करना ही “प्रदक्षिणा” कहलाता है।

अगर दार्शनिक भाव से परिक्रमा के महत्व को समझने का प्रयास करे तो- इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का जीवन एक चक्र ही तो है, “पुनःरपि जनमम-पुनःरपि मरणम” के चक्र में जीव घूमते रहता है। इस जीवन चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया है। यह सारी सृष्टि भगवान द्वारा निर्मित हुई है, और इसे एक दिन भगवान में ही समाहित हो जाना है। तो भगवान की परिक्रमा कर हम यह मान लेते है कि हमने सारी सृष्टि की ही परिक्रमा कर ली। एक बार शिवलोक में श्री गणेश और कार्तिकेय में इस बात पर बहस हो रही थी कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तब भगवान शिव ने कहा- तुम दोनों में से जो सर्वप्रथम समस्त ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर सबसे पहले लौट आएगा वही श्रेष्ठ माना जाएगा। कार्तिकेय जी अपने वाहन मोर पर सवार होकर ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने निकल पड़े, लेकिन श्री गणेश ने शिव-पार्वती की ही परिक्रमा लगा कर कहा की- यह सारा ब्रह्माण्ड तो आप ही से निर्मित है, आप इस सृष्टि के कण कण में समाहित है, अतः आपकी परिक्रमा कर मैंने सम्पूर्ण सृष्टि की ही परिक्रमा कर ली है।

किस देवता की कितनी परिक्रमा की जाए इसका विधान भी शास्त्रों में दिया हुआ है। इस बारे में यह श्लोक प्रचलित है- “एका चण्ड्या रवे: सप्त तिस्र: कार्या विनायके। हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा”। अर्थात, देवी दुर्गा (या अन्य किसी भी देवी) की एक परिक्रमा करनी चाहिए, एकमात्र प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यनारायण की सात परिक्रमा करनी चाहिए, गणेशजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है, भगवान विष्णु की चार परिक्रमा करनी चाहिए और भगवान शिव की आधी परिक्रमा करनी चाहिए। रुद्रावतार भगवान हनुमानजी की भी तीन परिक्रमा करने का विधान है। अन्य सभी ज्ञात अज्ञात देवताओं जिनकी प्रदक्षिणा का विधान किसी शास्त्र या पुराण में नही मिलता उसकी भी तीन परिक्रमा की जा सकती है। नारद पुराण में भी प्रदक्षिणा की यही संख्याएं बताई गई है। अब मन मे प्रश्न ये उठता है कि भगवान शिव की “आधी परिक्रमा” का विधान क्यो है, और ये आधी परिक्रमा कैसे लगाई जाती है।

शास्त्र कहते है कि भगवान शिव के “सोमसूत्र” को नही लांघना चाहिए। शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र कहते है। भगवान शिव के मंदिर में आपने देखा होगा, शिवलिंग के साथ ही निर्माल्य निकासी के लिए एक छोटी सी नाली बनी होती है। हम शिवलिंग का जो जल, दूध, दही, पंचामृत, पंचगव्य आदि से अभिषेक करते है वह सब उसी छोटी सी नाली द्वारा बाहर निकलता है। उसी नाली को “सोमसूत्र” कहते है। शास्त्र के अनुसार मनुष्य को इसका उलंघन नही करना चाहिए, ऐसा करने से उस मनुष्य द्वारा सञ्चित पुण्यों का नाश होता है, उसका वीर्य, तेज और बल क्षीण होता है, मनुष्य को नाना प्रकार के नर्क भोगने पड़ते हैं। सोमसूत्र में शिव का शक्ति स्त्रोत होता है, अतः पैरों द्वारा इसे लांघने से मनुष्य के वीर्य, तेज, बल और स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बाईं ओर से शुरू कर जलस्त्रोत अर्थात जलधारी के आगे निकले हुए भाग तक जाकर रुक जाना चाहिए, और फिर विपरीत दिशा में घूमकर लौटकर जलस्त्रोत के दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूर्ण करनी चाहिए।

किसी भी देवी देवता की परिक्रमा शुरू करने के बाद बीच मे रुकना नही चाहिए, न किसी से बातचीत करे, ऐसा करने से परिक्रमा अपूर्ण मानी जाती है। परिक्रमा हमेशा पवित्र भाव से करे। जिस भी देवी देवता की आप परिक्रमा कर रहे है, परिक्रमा करते समय हृदय में उसी का स्मरण करना चाहिए अथवा अपने इष्टदेव का भी स्मरण कर सकते है। प्रदक्षिणा का मंत्र है- “यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे”। अर्थात कि- हमारे द्वारा जाने-अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए। परमपिता परमेश्वर मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें। परिक्रमा पूर्ण करने के पश्चात साष्टांग दण्डवत करना चाहिए।

भगवान की परिक्रमा करने के सम्बन्ध में एक तथ्य यह भी प्रचलित है कि नित्यप्रति की पूजा आराधना से भगवान की मूर्ति के चारो ओर एक दिव्य तेजपुंज का निर्माण हो जाता है। परिक्रमा करने से हम उस तेजपुंज की दिव्यता को अपने अंदर समाहित कर स्वयं को पवित्र कर लेते है।

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