श्री शिव ताण्डव स्त्रोतम (Shiv Tandav Stotram) हिन्दी अनुवाद सहित

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शिव तांडव स्तोत्रम अत्यंत प्रभावशाली शिव स्तोत्र है, जिसके नित्य पाठ से भगवान शिव की भक्ति और उनकी कृपा प्राप्त होती है। शिव तांडव स्तोत्र रावण द्वारा रचा गया है, इसकी कठिन शब्दावली और अद्वितीय वाक्य रचना इसे अन्य मंत्रों से अलग बनाती है।

आपके जीवन में किसी भी सिद्धि की महत्वाकांक्षा हो इस स्तोत्र के जाप से आपको आसानी से प्राप्त हो जाएगी। सबसे ज्यादा फायदा आपकी वाक सिद्धि को होगा, अगर अभी तक आप दोस्तों में या किसी ग्रुप में बोलते हुए अटकते हैं तो यह समस्या इस स्तोत्र के पाठ से दूर हो जाएगी। इसकी शब्द रचना के कारण व्यक्ति का उच्चरण साफ हो जाता है। शिव तांडव स्तोत्र पढ़ने या सुनने मात्र से प्राणी पवित्र हो जाता है, शिवलोक को प्राप्त होता है और सारे भ्रम भी दूर हो जाते हैं।

रावण वेद शास्त्रों का ज्ञाता तो था ही, साथ ही महान शिवभक्त भी था। उसने भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न करके बहुत सारे वरदान प्राप्त किये थे। भगवान शंकर से अनेकों वरदान प्राप्त कर रावण अत्यंत ही अहंकारी हो गया था, धर्म कर्म को भूलकर निरीह जीवों पर अत्याचार करने लग गया था।

एक बार रावण ने अपनी शक्ति के मद में चूर होकर भगवान शिव के समक्ष अपनी शक्ति के प्रदर्शन के उद्देश्य से कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं में उठा लिया था। अन्तर्यामी भगवान आशुतोष ने रावण के मनोभाव को समझकर उसके अहंकार के नाश के लिए कैलाश पर्वत का भार बढ़ाने लगे जिसे रावण सहन नहीं कर सका।

रावण का घमण्ड चूर हुआ, उसे अपनी भूल का आभास हुआ और उसने धैर्य का परिचय देते हुए क्षणमात्र में ही “शिव तांडव स्तोत्रम” की रचना कर भोले भण्डारी के समक्ष अत्यंत ही सुंदर गायन किया, जिसे सुनकर भोलेनाथ अत्यंत ही प्रसन्न हुए और रावण को मनोवांछित वर प्रदान किया।

।। अथ श्री शिव ताण्डव स्तोत्रम ।।

जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले

गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजंग-तुंग-मालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं

चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ॥१॥

जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धाराएँ उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, जिनके गले में बड़े एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

जटा-कटा-हसं-भ्रमभ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी

विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि ।

धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

जिन शिव जी की जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरें उनके शीश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढ़ता रहे।

धरा-धरेन्द्र-नंदिनीविलास-बन्धु-बन्धुर

स्फुर-द्दिगन्त-सन्ततिप्रमोद-मान-मानसे ।

कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि

क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणीय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनकी कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनन्दित रहे।

जटा-भुजंग-पिंगल-स्फुरत्फणा-मणिप्रभा

कदम्ब-कुंकुम-द्रवप्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे ।

मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे

मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि ॥४॥

मैं उन शिवजी की भक्ति में आनन्दित रहूँ जो सभी प्राणियों के आधार एवं रक्षक हैं, जिनकी जटाओं में लिपटे सर्पों के फण की मणियों का प्रकाश पीले वर्ण प्रभा-समूह रूप केसर के कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और जो गजचर्म से विभूषित हैं।

सहस्रलोचनप्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर

प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सरांघ्रि-पीठभूः ।

भुजंगराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:

श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥५॥

जिन शिव जी के चरण इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों की धूल से रंजित हैं (जिन्हें देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पण करते हैं), जिनकी जटाओं में लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनंजय-स्फुलिंगभा

निपीत-पंच-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम् ।

सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं

महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः ॥६॥

जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पूज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्धि प्रदान करें।

कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल

धनंजया-याहुतीकृत-प्रचण्डपंच-सायके ।

धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक

प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम ॥७॥

जिनके मस्तक से धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर हैं (यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो।

नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुर

तू-कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः ।

निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः

कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

जिनका कण्ठ नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्या की रात्रि के सामान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें।

प्रफुल्ल-नीलपंकज-प्रपंच-कालिमप्रभा

वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे ॥९॥

जिनका कण्ठ और कन्धा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुन्दर श्याम प्रभा से विभूषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुःखों को काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।

अखर्वसर्व-मंगला-कला-कदंबमंजरी

रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम्

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जो कल्याणमय, अविनाशी, समस्त कलाओं के रस का आस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के संहारक, दक्षयज्ञ विध्वंसक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूँ।

जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजंग-मश्वस

द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंग-तुंग-मंगल

ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

अत्यंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढ़ी हूई प्रचण्ड अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार से सुशोभित हो रहे हैं।

दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजंग-मौक्ति-कस्रजो

गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः ।

तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः

समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टुकड़ों, शत्रु एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर समान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ।

कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुंज-कोटरे वसन्

विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मंजलिं वहन् ।

विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः

शिवेति मंत्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, सिर पर अंजलि धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा?

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥

देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते हुए सुगंधमय राग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेव जी के अंगों की सुन्दरता परमानन्दयुक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहे।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

प्रचण्ड वडवानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्टमहासिध्दियों तथा चंचल नेत्रों वाली कन्याओं से शिव विवाह समय गान की मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, संसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पायें।

इमं ही नित्यमेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमा शुयातिना न्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस उत्तमोत्तम शिव ताण्डव स्तोत्र को नित्य पढ़ने या श्रवण करने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरु शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं

यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरंग युक्तां

लक्ष्मीं सदैवसुमुखिं प्रददाति शंभुः ।।

प्रात: शिवपूजन के अंत में इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़े आदि सम्पदा से सर्वदा युक्त रहता है।

।। इति रावणरचितं श्री शिव ताण्डव स्त्रोतम सम्पूर्णमं ।।

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1 comment

  1. शिव तांडव स्त्रोत्र का वर्णन सामवेद में किया गया है ।

    रावण को चारों वेदों का ज्ञाता कहते हैं ।

    अतः वेद रावण से भी पहले लिखे गए थे और रावण का (शिव तांडव स्रोत ) रचने में कोई भूमिका नहीं है ।

    रावण ने तो केवल उसे याद करके शिव की आराधना करी थी ।

    अतः यह सत्य नहीं है कि यह रावण के द्वारा रचित है ।

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