भगवान शिव का दिया वरदान जब उन्ही पे पड़ गया भारी

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भगवान शिव को प्रसन्न करना बेहद आसान है। असुर हो, देवता हो या फिर कोई सामान्य मनुष्य, शिव ने कभी अपने भक्तों के साथ भेदभाव नहीं किया। सच्चे मन से की गई थोड़ी सी पूजा अर्चना से भी महादेव बड़ी जल्दी प्रसन्न हो जाते है, इसीलिए उनका एक नाम “आशुतोष” भी है। अगर कोई सच्चे मन और श्रद्धा के साथ उन्हें याद करता है तो वह बड़ी आसानी से उसे अपना बना लेते हैं और उसकी हर इच्छा को पूरी करते हैं। इसीलिए महादेव के भक्त उन्हें भोलेनाथ के नाम से भी जानते हैं।

एक बार की बात है। भस्मासुर नाम के एक दैत्य ने महादेव की घनघोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे वरदान मांगने को कहा। भस्मासुर ने महादेव से अमरता का वरदान मांगा। महादेव ने कहा- “यह सम्भव नही, यह पृकृति के विरुद्ध है। जो जन्मा है, उसका अंत भी तय है। अमर तो देवता भी नही है, तुम कोई और वरदान मांग लो”। भस्मासुर ने कहा, ‘हे महादेव, यदि आप मुझ पर प्रसन्न ही है तो मुझे वर दीजिए कि मैं जिसके भी सर पे हाथ रखूं वो तत्काल भस्म हो जाए’। महादेव ने कहा- “तथास्तु”। लेकिन भस्मासुर को यह वरदान देना भगवान शिव के लिए ही मुसीबत बन गया, क्योंकि भस्मासुर अपने वरदान का सर्वप्रथम परीक्षण भगवान शिव पर ही करना चाहता था, ताकि वह शिव को भस्म कर उनकी जगह ले सके। भगवान शंकर उसे वरदान दे चुके थे, एक बार दिया हुआ वरदान वापस नही लिया जा सकता था, इसीलिए महादेव को अपने रक्षण के लिए भस्मासुर के सामने से भागना पड़ा। अब महादेव आगे आगे, और भस्मासुर पीछे पीछे।

भगवान शिव ने विचार किया कि जब वरदान के अहंकार में ये असुर मुझे इतना परेशान कर सकता है तो संसार के सामान्य मनुष्यो का क्या हाल करेगा। तब सृष्टि के कल्याण के लिए और भस्मासुर के अंत के लिए महादेव ने श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया और इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने की प्रार्थना की। जगतपालक श्रीहरि विष्णु ने महादेव की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। महादेव अंतर्ध्यान हो गए और भगवान विष्णु “मोहिनी” रूप में भस्मासुर के सामने आ गए। मोहिनी बने भगवान विष्णु की सुंदरता से मोहित हो कर भस्मासुर आकर्षित हो गया, और भगवान शंकर को भस्म करने का विचार भूल गया। भस्मासुर ने मोहिनी से कहा- “हे सुंदरी! तुम्हारे जैसी सुंदर स्त्री मैंने आज तक नही देखी। तुम सुंदरता में श्रेष्ठ हो और मैं बल में श्रेष्ठ! तुम मुझसे विवाह कर लो, हम दोनों मिलकर इस संसार पर राज्य करेंगे”। मोहिनी ने कहा- “असुरश्रेष्ठ! मैं एक नृत्यांगना हूँ और मैं विवाह भी उसी पुरुष से करूंगी जो मेरे जैसा नृत्य करना जानता हो। अगर तुम मेरे कदम से कदम मिलाकर मुझ जैसा नृत्य करखे दिखाओ तो मैं तुमसे विवाह कर सकती हूँ”।

भस्मासुर ने कहा- देवी जी, हमने भी गुरुकुल में संगीत और नृत्य की थोड़ी बहुत शिक्षा ली थी, अगर आप मुझे थोड़ा और सीखा दे तो मैं भी बेहतरीन नर्तक बन जाऊंगा। मोहिनी तैयार हो गई और उसने भस्मासुर से कहा- ठीक है, जैसे जैसे मैं नृत्य करूंगी, मुझे देख देखकर तुम भी वैसा ही करते जाना। दोनो ने मिलकर नृत्य करना शुरू कर दिया। मोहिनी के कहे अनुसार भस्मासुर मोहिनी को देखकर नृत्य करने लगा, जो मुद्रा मोहिनी धारण करती, वह भी वैसी ही मुद्रा बना लेता। भस्मासुर अपनी सारी सुध बुध खोकर मोहिनी के साथ नृत्य करने लगा। नृत्य करते हुए अचानक मोहिनी ने एक ऐसी मुद्रा बनाई जिसमे उसका हाथ उसी के सर पर आ गया। मोहिनी की सुंदरता और नृत्य में खोये हुए भस्मासुर ने भी देखादेखी वैसी ही मुद्रा बना ली की भस्मासुर का हाथ स्वयं उसी के सर के ऊपर आ गया। महादेव के वरदान स्वरूप भस्मासुर स्वयं ही जलकर भस्म हो गया।

तत्पश्चात मोहिनी बने विष्णु ने महादेव को स्मरण करते हुए कहा- महादेव आपकी मुसीबत खत्म हुई, अब दर्शन दीजिए। महादेव प्रकट हुए, मोहिनी की सुंदरता में स्वयं महादेव भी सम्मोहित हो गए। भगवान शिव स्वयं नृत्य के देवता नटराज है, उनका भी मन हो गया मोहिनी के साथ नृत्य करने का। महादेव मोहिनी से बोले, “प्रभु! आपके मनभावन रूप को देखकर मेरे हृदय में भी नृत्य करने की उत्कंठा उत्पन्न हो रही है, फिर भस्मासुर जैसे असुर की क्या बिसात”। अब मोहिनी बने विष्णु और नृत्य के देवता भगवान नटराज शिव ने नृत्य करना शुरू कर दिया। नृत्य करते करते दोनो के शरीर से एक एक तेजपुंज निकला और दोनो तेजपुंज एकाकार हो गए। तब महादेव ने पवन देवता को बुलाया और वो तेजपुंज उनको देते हुए बोले, “पवनदेव, इस दिव्य तेजपुंज की रक्षा आपको करनी है”। पवनदेव ने कहा- “ठीक है प्रभु! जैसी आपकी इच्छा”। कालांतर में इसी तेजपुंज को धरतीलोक में वानर कुल के राजा “वानरराज केसरी” की पत्नी “अंजना” के गर्भ में प्रत्यारोपित किया गया जिससे भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार “पवनपुत्र हनुमान जी” का जन्म हुआ।

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