शनिवार (शनिदेव) व्रत कथा

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शनिदेव न्याय के देवता है, ग्रहमण्डल में उन्हें न्यायाधीश की जिम्मेदारी मिली हुई है। अक्सर लोग भूलवश शनिदेव को क्रूर देवता मान लेते है जबकि सच ये है कि शनिदेव लोगों को उनके कर्मों के हिसाब से ही फल देते हैं। शनि की साढ़े साती दशा कई दुःखों, विपत्तियों से व्यक्ति के जीवन को भर देती है। ऐसे में प्रारब्ध जनित संतापों की तीव्रता को कम करने के लिए आप शनि देवता की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। साथ ही आप शनिदेव का व्रत भी कर सकते हैं। बता दें कि श्रावण मास में शनिवार का व्रत अगर आप प्रारंभ करते हैं तो उसका विशेष लाभ मिलता है।

शनिदेव न्याय के देवता भी हैं इसलिए उनको प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीका तो यह है कि कभी किसी के साथ अन्याय ही ना करें। कुंडली मे अगर शनि ग्रह अशुभ फलदायी हो तो भी शनिदेव का पूजन अर्चन करना चाहिए। आज हिन्दुबुक के पन्नो से हम आपके लिए लेकर आए है शनिदेव (शनिवार) व्रत की कथा और उनकी पूजन विधि।

शनिवार व्रत की पूजन विधि :

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नहा धोकर और साफ कपड़े पहनकर पीपल के वृक्ष पर जल अर्पण करें। लोहे से बनी शनि देवता की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं। फिर मूर्ति को चावलों से बनाए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करें। इसके बाद काले तिल, फूल, धूप, काला वस्त्र व तेल आदि से पूजा करें। पूजन के दौरान शनि के दस नामों का उच्चारण करें- कोणस्थ, कृष्ण, पिप्पला, सौरि, यम, पिंगलो, रोद्रोतको, बभ्रु, मंद, शनैश्चर।

पूजन के बाद पीपल के वृक्ष के तने पर सूत के धागे से सात परिक्रमा करें, इसके बाद शनिदेव का मंत्र पढ़ते हुए प्रार्थना करें-

“शनैश्चर नमस्तुभ्यं नमस्ते त्वथ राहवे। केतवेअथ नमस्तुभ्यं सर्वशांतिप्रदो भव:”

इसके बाद शनिदेव की कथा पढ़े या किसी से सुनें, तत्पश्चात आरती कर प्रसाद ग्रहण करे। व्रत के दिन एक समय ही भोजन करें, वह भी बिना नमक का सादा सात्विक भोजन। घर मे अगर पूजन की व्यवस्था न हो पाए तो पास के किसी शनिमंदिर में जाकर पूजन कर सकते है, तथा वही बैठकर कथा पढ़ सकते है।

शनिवार व्रत कथा :

एक समय सभी नवग्रहओं (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु) में इस बात पर विवाद छिड़ गया था कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभी ग्रह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ साबित कर रहे थे किन्तु काफी समय तक कोई निर्णय न होता देख सभी ग्रह देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे। इंद्र इससे घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी। उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य का राज है जो कि समस्त पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ न्यायकर्ता है, वे ही इसका निर्णय कर सकते है।

देवराज इंद्र की सलाहनुसार सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताकर निर्णय करने के लिए कहा। राजा इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही नाराज हो जाएगा। तब राजा को एक उपाय सूझा। उन्होंने स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिये। फ़िर उन सबसे निवेदन किया, कि आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें। सभी ग्रहों के अपने अपने सिंहासन पर विराज जाने के बाद राजा ने सबसे कहा कि जिसका सिंहासन सबसे पहले है वो श्रेष्ठ और जिसका सिंहासन आखिर में होगा वो श्रेष्ठता में सबसे छोटा होगा।

इस अनुसार लौह का सिंहासन सबसे क्रम में सबसे आखिरी में होने के कारण, शनिदेव सबसे पीछे में बैठे, तो वही सबसे छोटे कहलाये। उन्होंने सोचा, कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है। उन्होंने कुपित हो कर राजा से कहा, “राजन! तू मुझे नहीं जानता है। सूर्य एक राशि में एक महीने, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीने, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते है, परन्तु मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हूँ। मैं न्यायाधीश की पदवी पर हूँ और जब जब जिसकी राशि में रहता हूँ उसके बुरे-भले कर्मों के अनुसार उसे अच्छा बुरा फल देता हूँ। श्री राम की साढ़े साती आने पर उन्हें वनवास हो गया, रावण की आने पर उसकी लंका को बंदरों की सेना से परास्त होना पड़ा, अब तुम सावधान रहना। ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहाँ से चले गये। अन्य देवता खुशी खुशी चले गये।

कुछ समय बाद राजा विक्रमादित्य की साढ़े साती आयी। तब शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर उज्जयिनी नगरी में आये। उनके साथ कई बढ़िया घोड़े थे। राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा की सवारी हेतु पसन्द किया। राजा ज्यों ही उस पर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा, भीषण वन में पहुंच वह घोड़ा अचानक अंतर्ध्यान हो गया, और राजा वन में ही भूखा प्यासा भटकता रहा। तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया, राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी। वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और वहाँ अपने आप को उज्जैन निवासी बताया। वहाँ एक सेठ की दूकान में उन्होंने जल इत्यादि पिया, और कुछ विश्राम भी किया। भाग्यवश उस दिन सेठ की बड़ी अच्छी बिक्री हुई। सेठ ने उसे अच्छा शगुन माना और खुश होकर राजा को भोजन कराने अपने साथ घर ले गया।

भोजन करते हुए राजा की दृष्टि एक खूंटी पर पड़ी जिसपर एक कीमती हार टंगा था, राजा के देखते देखते ही अचानक खूंटी ने उस हार को निगल लिया। राजा यह देखकर हैरान परेशान था की कुछ देर बाद सेठ ने देखा कि हार गायब है। उसने समझा कि इसी मनुष्य ने हार चुराया है। उस सेठ ने राजा को नगर कोतवाल के पास पकड़वा दिया। कोतवाल ने विक्रमादित्य को अपने राजा के सामने प्रस्तुत किया, राजा ने भी विक्रमादित्य को चोर समझ कर उनके हाथ पैर कटवा दिये, वह चौरंगिया बन गया और नगर के बाहर फिंकवा दिया गया। वहाँ से एक तेली निकल रहा था, जिसे उसपर दया आयी, और वो विक्रमादित्य के धड़ को अपने घर ले गया। तेली के भोजन पानी के बदले विक्रमादित्य कोल्हू पर बैठकर अपने मुख से आवाज देकर बैलों को हाँकने का काम करने लगे।

 

कुछ काल बाद राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी। वर्षा काल आने पर एक दिन वह ऊंचे स्वर में राग मल्हार गा रहे थे, उस नगर की राजकुमारी ने महल की अटारी से उनका गायन सुना। राजकुमारी को उनका गायन इतना पसन्द आया कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने दासी को गायक का पता लगाने भेजा, दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया है, जिसके हाथ पैर नही है केवल धड़ है, परन्तु राजकुमारी का निश्चय तो दृढ़ था। उसने अपने पिता से अपनी इच्छा बताई, राजा रानी ने उसे बहुत समझाया लेकिन उसने किसी की नही मानी। थक हार कर राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा। उसका विवाह राजकुमारी से हो गया।

कुछ समय बाद एक रात सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा, “राजन! देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है। तब राजा ने उनसे क्षमा मांगी, और प्रार्थना की, हे शनिदेव! जैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना देना। शनिदेव मान गये, और कहा की जो मेरा व्रत रहेगा और व्रत की कथा कहेगा-सुनेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे। साथ ही शनिदेव ने राजा विक्रमादित्य को हाथ पैर भी वापस दिये।

प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। राजा ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए। सेठ ने जब सुना, तो वह पैरों पर गिर कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। सेठ ने निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या से पाणिग्रहण का निवेदन किया। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानीयों मनभावनी और श्रीकंवरी को लेकर उज्जैन नगरी को पधारे। नगरवासियों ने उनका जोरदार स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। राजा ने घोषणा की, कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया था, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बिताया।

जो कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। हे शनिदेव! जैसे आपने राजा विक्रमादित्य के दुख दूर किए वैसे ही सबके दुख दूर किए।

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