श्री दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ (हिन्दी भावार्थ सहित) : 7 श्लोकों में पाएं सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ का लाभ

शेयर करना न भूलें :

श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ माता को अति प्रिय है, परंतु सप्तशती में सात सौ श्लोक है जो तेरह अध्यायों में आते है। माँ के भक्तों के मन में इच्छा रहती है कि वे कम से कम नवरात्र में तो श्रीदुर्गासप्तशती का नियमित पाठ कर ही लें परंतु अर्गला, किलक और कवच पाठ के साथ सप्तशती के सात सौ श्लोकों का पाठ करने में समय लगता है।

आज की भागदौड़ भरी दिनचर्या में, नौकरी आदि की व्यस्तता या सफर में होने के कारण समय की दिक्कत हो जाती है, बहुत से लोग इस डर से पाठ आरंभ ही नहीं करते कि कहीं वे प्रतिदिन न कर पाएं तो दोष लगेगा, ऐसे में हम भक्तों को बताना चाहेंगे कि उन्हें परेशान होने की आवश्यकता ही नही है।

इसका बहुत सरल विकल्प श्रीदुर्गासप्तशती में ही बताया गया है। सिर्फ 10 मिनट की पूजा में पूरी सप्तशती के पाठ का फल प्राप्त हो सकता है। सात सौ श्लोकों के में से सात श्लोक ऐसे हैं जो माता को सर्वाधिक प्रिय हैं और उनके पाठ से सप्तशती का पाठ मान लिया जाता है, इसे ही “सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र” कहा जाता है।

ऋषियों ने संपूर्ण सप्तशती में से सिर्फ सात श्लोक निकालकर “सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र” की रचना की है। इन सात श्लोकों में श्रीदुर्गासप्तशती के 700 श्लोकों के फल के माहात्म्य को संकलित किया गया है। इसके पाठ को सप्तशती के संपूर्ण पाठ के समान माना जाता है। इसका पाठ करने की छोटी सी विधि है, उस विधि का पालन करते हुए यदि सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ किया जाए तो पाठ पूर्ण माना जाता है।

पाठ कैसे करें आरंभः

* सप्तश्लोकी पाठ का आरंभ करने से पूर्व श्रीदुर्गासप्तशती ग्रंथ का पंचोपचार विधि से पूजन करना चाहिए।

* पंचोपचार अर्थात जल, धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, कुमकुम, सुगंध, नैवैद्य आदि उपलब्ध वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए।

* यदि आप सभी मंत्रों के उच्चारण आदि में समर्थ नहीं है तो कम से कम नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करते हुए ग्रंथ को धूप-दीप दिखाएं, फिर जल छिड़कें, पुष्प अर्पित करें, अक्षत आदि जो भी उपलब्ध सामग्रियां हैं समर्पित करें।

मंत्रः

“नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम्”

इसके बाद ग्रंथ को पूरे श्रद्धा और आदरभाव के साथ प्रणाम करें, उनसे हाथ जोड़कर पाठ की अनुमति ले, और पाठ आरम्भ करें।

 ।।अथ श्री सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र।।

शिव उवाच :

देवि त्वं भक्त सुलभे सर्वकार्य विधायिनी ।
कलौ हि कार्य सिद्धयर्थम् उपायं ब्रूहि यत्नतः ॥

भगवान शिव ने देवी से कहा :-
हे देवी! आप ही सुलभ सहाय हो, समस्त सिद्धियों प्रदान कर मनोकामना पूरी करने वाली हो, कलियुग में भी भक्तों के कार्यों को सिद्ध करने वाला कोई उपाय कहिए।

देव्युवाच :

श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट साधनम् ।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बा स्तुतिः प्रकाश्यते ॥

देवी बोली :-
हे देवों के देव महादेव! कलियुग में सभी मनोकामनाएं सिद्ध होने वाला उपाय आपसे कहती हूँ। आपसे अत्यधिक स्नेह के कारण मैं सर्व कामना सिद्ध करने वाली “अम्बा-स्तुति” बताती हूँ।

विनियोग :

ॐ अस्य श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मन्त्रस्य नारायण ॠषिः, अनुष्टुप
छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गाप्रीत्यर्थं
सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ।

इस सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र के रचयिता श्रीनारायण ऋषि है। इसमें अनुष्टुप छंद है, श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता है, श्री दुर्गा माता की प्रसन्नता के लिए सप्तश्लोकी दुर्गा नामक स्तोत्र के पाठ का विनियोग करता/करती हूँ।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।।१।।

वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्य दुःख भयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता ।।२।।

माँ दुर्गे! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती है और स्वस्थ पुरूषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती है। दुःख दरिद्रता और भय हरने वाली देवी! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो।

सर्वमङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥३॥

हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो, कल्याणदायिनी शिवा हो। सब षुरूषार्थों को सिद्ध करने वाली हो। शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। आपको नमस्कार है।

शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ॥४॥

शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीडा दूर करने वाली नारायणी देवि! आपको नमस्कार है।

सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ॥५॥

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्य रूपा दुर्गे देवि! सभी भयों से हमारी रक्षा करो, आपको नमस्कार है।

रोगानशेषानपंहसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता हि आश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥

हे देवि! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती है और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती है। जो लोग आपकी शरण में हो, उन पर विपत्ति तो आती ही नही है। आपकी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते है।

सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यम् अस्मद् वैरि विनाशनम् ॥७॥

सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।

॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण ॥

शेयर करना न भूलें :

Leave a Reply

You cannot copy content of this page