कथा सम्यन्तक मणि की, जब भगवान श्रीकृष्ण पर लगा था चोरी करने का कलंक

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कृष्ण की द्वारिकापुरी में सतराजित नाम का एक यदुवंशी रहता था। भगवान सूर्य के साथ उसकी मित्रता थी। सूर्यनारायण ने उसे अपनी सम्यन्तक मणि उपहारस्वरूप दी थी, जो प्रतिदिन अपने भार का आठ गुना सोना दिया करती थी। सम्यन्तक मणि पाकर सतराजित बड़ा प्रसन्न था और मणि को अपने गले मे पहनकर सारी नगरी में इतराता घूमता था। एक बार कृष्ण ने सतराजित से कहा कि वो इस मणि को राजकोष में जमा करवा दे, ताकि इससे प्राप्त धन से प्रजा के हित मे कार्य किए जा सकें। लेकिन सतराजित ने सम्यन्तक मणि को राजकोष में जमा करवाने से मना कर दिया।

एक दिन सतराजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को अपने गले मे पहनकर जंगल मे शिकार खेलने गया था। वहाँ एक सिंह ने उसे मार दिया और उसकी मणि लेकर चला गया। ऋक्षराज जाम्बवन्त ने जब सिंह को एक दिव्य और चमकदार मणि के साथ देखा तो जाम्बवन्त जी ने सिंह को मार दिया और मणि लेकर अपनी गुफा में आ गए एवं अपनी पुत्री जाम्बवन्ती को वह मणि खेलने के लिए दे दी। इधर जब कई दिनों तक प्रसेनजित घर लौटकर नही आया तो सतराजित ने सारी नगरी में यह प्रचार कर दिया कि कृष्ण की नज़र पहले से ही मेरी मणि पर थी और हो न हो कृष्ण ने ही मेरे भाई के साथ कुछ कर दिया है और वो मणि ले ली। कृष्ण को जब इस लांछन के बारे में पता चला तो अपने ऊपर लगे इस कलंक को मिटाने के लिए समाज के कुछ गणमान्य लोगों को साथ लेकर प्रसेनजित की खोज में जंगल की ओर चल दिए।

जंगल मे जाकर सबने देखा कि प्रसेनजित तो मरा पड़ा है और पास में ही सिंह के पैरों के निशान भी है तो सबने यह अनुमान लगा लिया कि इस सिंह ने ही प्रसेनजित को मार दिया है। सिंह के पदचिन्हों को लक्ष्य करते हुए सभी आगे बढ़ने लगे, आगे जाकर देखा तो सिंह भी मरा हुआ है और नजदीक ही एक रीछ के पैरों के निशान है। रीछ के पैरों के निशानों का पीछा करते करते सारे लोग जाम्बवन्त की गुफा तक आ पहुंचे। वहाँ जाकर देखा कि जाम्बवन्ती उस मणि के साथ खेल रही है। जाम्बवन्त ने जब कृष्ण और अन्य लोगो को देखा तो उन्हें युद्ध का आव्हान दिया। कृष्ण ने आव्हान स्वीकार करते हुए जाम्बवन्त के साथ युद्ध का निश्चय किया।

कई दिनों तक जाम्बवन्त और कृष्ण के बीच मल्लयुद्ध होता रहा। अंत मे जाम्बवन्त ने हार मानते हुए कृष्ण से कहा- “प्रभु! मैंने आपको पहचान लिया है। त्रेतायुग में रामावतार की लीला समाप्त कर जब आप अपने परम धाम को प्रस्थान कर रहे थे तभी आपने मुझसे कहा था कि द्वापरयुग में फिर आपसे मुलाकात होगी। मैंने कहा था कि प्रभु मैं आपको कैसे पहचानूंगा? तब आपने कहा था कि मल्ल युद्ध मे सिवाय आपके मुझे कोई नही परास्त कर सकता। आज आपने मुझे मल्लयुद्ध में परास्त कर दिया, मैं आपको पहचान गया हूँ, आप सर्वेश्वर जगतपालक श्रीहरि के अवतार है। कृष्ण ने जाम्बवन्त को अपने ऊपर लगे कलंक की बात बताई और उनसे सम्यन्तक मणि वापस देने को कहा। जाम्बवन्त ने अपनी पुत्री जाम्बवन्ती का विवाह कृष्ण के साथ कर दिया और दहेज में वही सम्यन्तक मणि कृष्ण को दे दी।

कृष्ण ने मणि को ले जाकर सतराजित को दे दिया। सतराजित कृष्ण पर मिथ्यारोप लगाने पर बड़ी ग्लानि महसूस कर रहा था। उसने कृष्ण से क्षमा मांगी और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण के साथ कर दिया और वह मणि भी कृष्ण को ही दे दी।

दरअसल, भगवान कृष्ण ने एक बार गलती से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चन्द्रमा का दर्शन कर लिया था, इसीलिए उनपर चोरी का झूठा कलंक लगा। एक बार श्रीगणेश के विचित्र आकर को देखकर चन्द्रमा ने उनका उपहास किया था। गणेशजी ने क्रोधित होकर चन्द्रमा को श्राप दे दिया था कि आज से जो भी तुम्हे देखेगा उसे कलंक लगेगा। चन्द्रमा ने सोमनाथ में आकर भगवान शंकर की तपस्या की, भगवान शंकर प्रसन्न हुए, गणेश जी से आग्रह किया कि सृष्टि के संचालन में चंद्रमा की महत्वपूर्ण भूमिका है, इसीलिए अपने श्राप में कुछ संशोधन कर दीजिए। गणेशजी ने अपने श्राप को घटाकर एक दिन के लिए कर दिया और कहा कि- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन जो भी कोई चन्द्रमा के दर्शन करेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा। गणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले को यह श्राप नही लगता।

अगर आपने भूलवश इस दिन कभी चन्द्रमा का दर्शन कर भी लिया है, तो ऊपर बताई गई कृष्ण और सतराजित कि कथा सुनने से इस श्राप से मुक्ति हो जाती है।

गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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