क्यों करना पड़ा था देवताओं को समुद्र मंथन

शेयर करना न भूलें :

समुद्र मन्थन की कथा तो आप सब को पता ही है। कैसे देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया जिसमें से अनेक रत्नों के साथ कालकूट विष, कल्पवृक्ष, अप्सराएं, मदिरा, उचैश्रवा नामका घोड़ा, अमृत, और देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में दैत्यों को छल कर देवताओं को अमृत पिलाया था। लेकिन देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन क्यों किया था इसके पीछे का रहस्य आज हम अपने पाठकों के लिए हिन्दुबुक के पन्नो से निकाल कर लाए है:

एक बार ऋषि दुर्वासा के ह्रदय में श्रीहरि विष्णु के दर्शनों की तीव्र उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, सो वे प्रभु के दर्शनों के लिए बैकुंठ लोक चले आए। दर्शन के बाद प्रभु की स्तुति कर जब वे वापस जाने लगे तब श्रीहरि ने अपने कंठ से एक मोतियों की माला उतारकर दुर्वासा ऋषि के गले मे पहना दी। भगवान विष्णु को ब्राह्मण अतिप्रिय है, फिर जब एक ब्राह्मण घर पे दर्शनों के लिए आया तो खाली हाथ वापिस कैसे जाता? सो प्रभु ने अपने गले की माला दुर्वासा जी को पहना दी। भगवान के हाथ से माला पाकर तो दुर्वासा जी की खुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा। वे मस्ती में झूमते हुए जा रहे थे, झूमते भी क्यों नही? आखिर माला रूपी भगवद’प्रसादी जो मिल गई थी। राह में जो भी मिलता उसे ही अपनी माला दिखाने लग जाते।

“अरे देखो! ऐसी माला देखी है कही?

“अरे नही महाराज। इतनी आकर्षक माला तो आज से पहले कभी नही देखी! कहाँ से मिली?

“अरे मिली नही। स्वयं भगवान विष्णु ने मुझे पहनाई है। भगवान का प्रसाद है भाई ये।

ऐसे ही अपनी मस्ती में मस्त होकर दुर्वासा ऋषि जा रहे थे कि अचानक सामने से अपने ऐरावत हाथी पर बैठकर जाते हुए देवराज इन्द्र मिल गए। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि को देखा तो ऐरावत से उतरकर दुर्वासा जी को दण्डवत प्रणाम किया। दुर्वासा ऋषि आज प्रसन्नचित्त थे तो आशीर्वाद स्वरूप भगवान विष्णु की दी हुई माला अपने गले से उतारकर इन्द्र को दे दिए। इन्द्र अपने पद की गर्मी में गर्वित थे इसीलिए मन मे सोचने लगे, “देखो इस महाराज को, अपनी पहनी हुई माला उतारकर मुझे पहना रहा है”। तभी दुर्वासा जी ने इंद्र की मनोस्थिति भांपकर कहा-” देवराज! ये कोई साधारण माला नही है। स्वयं भगवान विष्णु ने मुझे पहनाई थी, वही माला मैंने तुम्हें दी है। इसे भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करो”। इतना कहकर दुर्वासा जी अपने रास्ते चलते बने।

लेकिन हर कोई तो भगवद प्रसादी का महत्व नही समझता। इन्द्र ने विचार किया- कि पहले भगवान विष्णु ने ये माला पहनी, फिर दुर्वासा ऋषि ने पहनी और अब मुझे दे गए। दुसरो के गले से उतरी हुई माला भला मैं कैसे पहन लूँ? यह विचार कर इन्द्र ने वह मोतियों की माला ऐरावत के सर पर रख दी। अब ऐरावत तो जानवर ठहरा, उसे भले बुरे का क्या गया। उसने अपने सूंड से उस माला को पकड़कर नीचे फेंक कर अपने पैरों से कुचल दिया। उधर दुर्वासा ऋषि ने माला देवराज को दे तो दी, लेकिन वे उसकी दिव्यता को भुला नही पा रहे थे। ज्यादा दूर तक नही गए थे, इसीलिए सोचा की चलो एक बार चलकर देख तो लूँ उस माला को पहनकर इन्द्र कैसे लग रहा है। हाथी का अपने पैरों से उस माला को कुचलना था कि इतने में ही दुर्वासा ऋषि का पुनरागमन हुआ। दुर्वासा ऋषि ने भगवान विष्णु की दी हुई माला का जब ऐसा अपमान देखा तो क्रोध में भरकर इन्द्र को श्राप दे दिया- “अरे मूर्ख! अपने पद और श्री के घमंड में भरकर तूने भगवान विष्णु और मेरा अपमान किया है, मैं श्राप देता हूँ तेरा ये पद, वैभव, सम्मान, सौभाग्य सब नाश हो जाएगा। तू “श्री” विहीन हो जाएगा”

दैत्यगुरु शुक्राचार्य को जब इस घटना का पता चला उन्होंने दैत्य सेना को सज्ज कर कहा कि बढ़िया मौका है, दुर्वासा ऋषि के श्राप से इन्द्र श्रीविहीन हो गया है। चलो स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दो। देवताओं और असूरों में युद्ध शुरू हो गया। श्री और सौभाग्य से विहीन देवता पराजित हुए, असुर सेना विजयी हुई। सारे देवता भगवान विष्णु की शरण मे पहुँचकर सहायता की याचना करने लगे। भगवान विष्णु ने कहा- “दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवराज इन्द्र तुम्हारा सौभाग्य समुद्र के रसातल में समा गया है। अब अपना खोया हुआ श्री और सैभाग्य पुनः प्राप्त करने के लिए तुम्हे समुद्र मंथन करना होगा।”

इसके बाद भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया।

शेयर करना न भूलें :

Leave a Reply

You cannot copy content of this page