क्यों किया जाता है देव प्रतिमाओं का जल में विसर्जन! पढ़िए विसर्जन की धार्मिक मान्यता

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हमारा भारत देश तीज त्यौहारों का देश है, उत्सवों का देश है, पर्वो का देश है, रीति रिवाजों का देश है, मान्यताओं का देश है, परम्पराओं का देश है। सनातन हिन्दू धर्म प्रत्येक दिवस को उत्सव की तरह मनाने की शिक्षा देता है, जीवन के हर एक क्षण को उत्साहपूर्वक जीने की शिक्षा देता है। हम वर्ष भर कोई न कोई तीज त्यौहार उत्सव-पर्व मनाते ही रहते है। गणेश उत्सव हो चाहे नवरात्रों में दुर्गा उत्सव, बसंत पंचमी में सरस्वती पूजन हो या दीपावली में महालक्ष्मी पूजन! भारत के विभिन्न प्रान्तों में ये सभी त्यौहार बड़े ही उत्साहपूर्वक मनाए जाते है, हालांकि इन्हें मनाने के तौर तरीके भिन्न हो सकते है लेकिन इन त्यौहारों के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आस्था सभी की एक जैसी होती है।

घर मे या सार्वजनिक पंडालों में बड़े ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ भगवान की मूर्तियों की स्थापना की जाती है, विधि विधान से उनकी पूजा अर्चना के बाद एक निश्चित तिथि को उन प्रतिमाओं का आसपास के नदी या तालाबो में विसर्जन किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते है कि देव प्रतिमाओं का जल में ही विसर्जन क्यो किया जाता है? क्या आप जानते है इसके पीछे की धार्मिक मान्यता? हिन्दुबुक के पन्नो से आज हम आपके लिए लेकर आएं है देव प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करने के पीछे की धार्मिक मान्यता

शास्त्रानुसार माना जाता है कि जल ब्रह्म का ही स्वरूप है। जब सृष्टि का निर्माण नहीं हुआ था तब यहां केवल जल ही जल था और सृष्टि के अंत में जब जलप्रलय होगी और समस्त सृष्टि जल में डूब जाएगी तब भी इस सृष्टि में केवल जल ही जल बचेगा।

इसलिए कहा जा सकता है कि जल ही सृष्टि का आरंभ, मध्य और अंत है। जल में त्र‌िदेवों का भी वास माना जाता है। जल को बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, वरुण देव जल के स्वामी है और भगवान विष्णु जी के अंश है।

जल में ही जगतपालक भगवान श्रीहरि विष्णु का भी वास माना जाता है इसीलिए उनका एक नाम “नारायण” भी है, और भगवान विष्णु ही समस्त सृष्टि के कारक और कारण है। इस सृष्टि के समस्त चर अचर जीव जंतु, प्राणी पशु, मनुष्य, सभी देवी देवता आदि सब भगवान विष्णु से ही उत्पन्न हुए है, और उन्हें एक दिन भगवान विष्णु में ही विलीन हो जाना है।

जब हम किसी भी देवता की विधि विधान पूर्वक मूर्ति स्थापना करते है तो हमारा यह विश्वास होता है कि उस मूर्ति में उस देवता का अंश स्थापित हो जाता है। पूजन अर्चन उपरांत विसर्जन के रूप में हम उस देवता के अंश को पुनः आद‌ि अनंत भगवान व‌िष्‍णु को समर्पित कर देते है। आव्हान पूजन के बाद विसर्जन भी षोडशोपचार पूजा की एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक क्रिया है।

जल में देवी देवताओं की प्रतिमाओं का विसर्जन करने से उनका अंश मूर्ति से निकलकर वापस अपने लोक चला जाता है और परम ब्रह्म में लीन हो जाता है, इसी कारण से मूर्तियों को जल में विसर्जित किया जाता है।

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मूर्ति विसर्जन का एक प्रतीक यह भी है कि सृष्टि के अंत मे जब जलप्रलय होगा तब जल ही समस्त सृष्टि को अपने भीतर समेट लेगा।

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