गौरक्षा के लिए स्वयं के प्राणों की बाजी लगाने वाले सूर्यवंशी राजा दिलीप

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शास्त्रो में राजा को भगवान की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यकुल में जन्मे इक्ष्वाकुवंशी महाराज दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ। हिन्दुबुक के पन्नो से आज हम आपके लिए लेकर आ रहे है, राजा दिलीप के गौ प्रेम की कथा:

अयोध्या के प्रतापी महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी। देवासुर संग्राम में इन्द्रदेव ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देवों और असुरो के मध्य भयंकर युद्ध हुआ, युद्ध मे देवता विजयी हुए। युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय महाराज दिलीप को मार्ग में कामधेनु गाय मिली, किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उन्हें देखा नहीं, कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की। इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने राजा दिलीप को पुत्रहीन होने का श्राप दे दिया। महाराज दिलीप को श्राप का कुछ पता नहीं था, किंतु उनके कोई पुत्र न होने से वे स्वयं, महारानी तथा प्रजा के लोग भी चिन्तित एवं दुखी रहते थे। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महाराज दिलीप रानी के साथ कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रमपर पहुंचे, महर्षि सब कुछ समझ गए। महर्षि ने कहा यह गौ माता के अपमान के पाप का फल है। सुरभि गौ की पुत्री नंदिनी गाय हमारे आश्रम पर विराजती है। महर्षि ने आदेश दिया- कुछ काल तक हमारे ही आश्रम में रहो और मेरी कामधेनु नन्दिनी की सेवा करो।

महाराज ने गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली। महारानी सुदक्षिणा प्रात: काल उस गौ माता की भलीभाँति पूजा करती थी, नित्यप्रति आरती उतारकर नन्दिनी को पति के संरक्षण-में वन में चरने के लिये विदा करती। सम्राट दिनभर छाया की भाँती उसका अनुगमन करते, उसके ठहरने पर ठहरते, चलनेपर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीनेपर जल पीते। राजा रानी दोनों ही तन मन से नन्दिनी की सेवा करने लगे। एक दिन वन में नन्दिनी का अनुराग करते करते महाराज दिलीप की दृष्टि क्षणभर के लिए अरण्य (वन) की प्राकृतिक सुंदरता में अटक गयी कि तभी उन्हें नन्दिनी का आर्तनाद सुनायी दिया।

राजा ने देखा कि वह एक भयानक सिंह के पंजों में फँसी छटपटा रही थी। राजा ने सिंह को मारने के लिये अपने तरकश से तीर निकालना चाहा, किंतु उनका हाथ जडवत निश्चेष्ट होकर वहीं अटक गया, हाथ ने हिलना डुलना बन्द कर दिया, वे आश्चर्य से खड़े रह गये और भीतर ही भीतर छटपटाने लगे, तभी मनुष्य की वाणी में सिंह बोल उठा- “राजन! तुम्हारे शस्त्र संधान का श्रम उसी तरह व्यर्थ है जैसे वृक्षों को उखाड़ देनेवाला प्रभंजन पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है। मैं भगवान शिव के गण निकुम्भ का मित्र कुम्भोदर हूं। भगवान शिव ने सिंहवृत्ति देकर मुझे इस वन के देवदारुओ की रक्षा का भार सौंपा है। इस समय जो भी जीव सर्वप्रथम मेरे दृष्टि पथ में आता है वह मेरा भक्ष्य बन जाता है। इस गाय ने इस संरक्षित वनमें प्रवेश करने की अनाधिकार चेष्टा की है और मेरे भोजन के समय यह मेरे सम्मुख आयी है, अत: मैं इसे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करूँगा। तुम लज्जा और ग्लानि छोड़कर वापस लौट जाओ।

किंतु परदु:खकातर महाराज दिलीप भय और व्यथा से छटपटाती, नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाती नन्दिनी को देखकर और उस संध्याकाल मे अपनी माँ की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करनेवाले उसके दुधमुँहे बछड़े का स्मरण कर करुणा-विगलित हो उठे। नन्दिनी का मातृत्व उन्हें अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान जान पड़ा और उन्होंने सिंह से प्रार्थना की कि वह नन्दिनी के बदले उनके शरीर को खाकर अपनी भूख मिटा ले और बालवत्सला नन्दिनी को छोड़ दे।

सिंह ने राजा के इस प्रस्ताव का उपहास करते हुए कहा- राजन! तुम चक्रवर्ती सम्राट हो, गुरु को नन्दिनी के बदले करोड़ों दुधारू गौएँ देकर प्रसन्न कर सकते हो। अभी तुम युवा हो, इस तुच्छ प्राणीके लिये अपना स्वस्थ-सुन्दर शरीर और यौवन की अवहेलना कर स्वयं के प्राण अर्पण के लिए तत्पर स्रम्राट दिलीप! लगता है, तुम अपना विवेक खो बैठे हो। यदि प्राणियों पर दया करने का तुम्हारा व्रत ही है तो भी आज यदि इस गाय के बदले में मैं तुम्हें खा लूँगा तो तुम्हारे मर जानेपर केवल इस एक प्राणी के ही प्राणों की रक्षा हो सकेगी और यदि तुम जीवित रहे तो पिता की भाँती सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करते रहोगे। इसलिये तुम अपने प्राणों की रक्षा करो। स्वर्गप्राप्ति के लिये तप त्याग करके शरीर को कष्ट देना तुम जैसे अमित ऐश्वर्यशालियों के लिये निरर्थक है। स्वर्ग! अरे वह तो इसी पृथ्वीपर है, जिसे सांसारिक वैभव-विलास के समग्र साधन उपलब्ध हैं, वह समझो कि स्वर्ग में ही रह रहा है। स्वर्गका काल्पनिक आकर्षण तो मात्र विपन्नो के लिए ही है, सम्पन्नो के लिए नहीं। इस तरह से सिंह ने राजा को भ्रमित करने का प्रयत्न किया।

राजा ने क्षत्रियत्व के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उत्तर दिया- नहीं सिह! नहीं, मैं गौ माता को तुम्हारा भक्ष्य बनाकर नहीं लौट सकता। मैं अपने क्षत्रियत्व को क्यों कलंकित करूं? क्षत्रिय संसार में इसलिये प्रसिद्ध हैं कि वे विपत्ति से औरों की रक्षा करते हैं। केवल राज्य का भोग उनका लक्ष्य नहीं, उनका लक्ष्य तो है लोकरक्षासे कीर्ति अर्जित करना। निन्दा से मलिन प्राणों और राज्य को तो वे तुच्छ वस्तुओ की तरह त्याग देते हैं इसलिये तुम मेरे इस शरीर को अपना भक्ष्य बनाओ और गौमाता नन्दिनी को छोड़ दो। संसार यही कहेगा की गौ माता की रक्षा के लिए एक सूर्यवंश के राजा ने प्राण की आहुति दे दी। एक चक्रवर्ती सम्राट के प्राणों से भी अधिक मूल्यवान एक गाय है।

सिंह ने कहा – अगर आप अपने शरीर को मेरा आहार बनाना ही चाहते है तो ठीक है। सिंह के स्वीकृति दे देने पर राजर्षि दिलीप ने शस्त्रो को फेंक दिया और उसके आगे अपना शरीर मांसपिंड की तरह खाने के लिये डाल दिया और वे भूमि पर बैठकर सिंह के आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे, तभी आकाश में स्तिथ देवता गण उनपर पुष्पवृष्टि करने लगे।

नन्दिनी ने कहा हे पुत्र! उठो! यह मधुर दिव्य वाणी सुनकर राजा को महान आश्चर्य हुआ और उन्होंने वात्सल्यमयी जननी की तरह अपने स्तनोंसे दूध बहाती हुई नन्दिनी गौ को देखा, किंतु सिंह दिखलायी नहीं दिया। आश्चर्यचकित दिलीप से नन्दिनी ने कहा- हे सत्युरुष! तुम्हारी परीक्षा लेने के लिये मैंने ही माया से सिंह की रचना की थी। महर्षि वसिष्ठ के प्रभाव से यमराज भी मुझपर प्रहार नहीं कर सकता तो अन्य सिंहक सिंहादिकी क्या शक्ति है। मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दयाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं। वर माँगो! तुम मुझे दूध देनेवाली मामूली गाय मत समझो, अपितु सम्पूर्ण कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु जानो।

राजा ने दोनों हाथ जोड़कर वंश चलानेवाले अनन्तकीर्ति पुत्रकी याचना की नन्दिनीने ‘तथास्तु’ कहा। उन्होंने कहा राजन मै आपकी गौ भक्ति से अत्याधिक प्रसन्न हूं , मेरे स्तनों से दूध निकल रहा है उसे पत्तेके दोने में दुहकर पी लेनेकी आज्ञा गौ माता ने दी और कहा तुम्हे अत्यंत प्रतापी पुत्र की प्राप्ति होगी।

राजाने निवेदन किया- मां ! बछड़े के पीने तथा होमादि अनुष्ठान के बाद बचे हुए दूध पर ही मेरा अधिकार है। दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है और द्वितीय अधिकार गुरूजी का है। राजा के धैर्य ने नन्दिनी के हृदय को जीत लिया। वह प्रसन्नमना कामधेनु राजा के आगे आगे आश्रम को लौट आयी । राजा ने बछड़े के पीने तथा अग्निहोत्र से बचे दूधका महर्षि की आज्ञा पाकर पान किया, फलत: वे रघु जैसे महान यशस्वी पुत्र से पुत्रवान हुए। सम्राट रघु बड़े ही प्रतापी थे, सदैव धर्म के पथ पर चले, और उन्होंने इतना यश कमाया की उन्ही के नाम पर इक्ष्वाकु वंश उनके बाद से “रघुवंश” कहलाया, और आगे चलकर इसी रघुवंश में जगतपालक भगवान विष्णु ने “श्रीराम” के रूप में अवतार लिया।

।। जय श्री राम ।।

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