प्रदोष व्रत के फल से सभी मनोकामनाएं होती है पूरी, पढ़िए व्रत की विधि और कथा

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हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और भगवान शिव की कृपा प्रदान करनेवाला होता है। प्रत्येक पक्ष की “त्रयोदशी तिथि” के व्रत को “प्रदोष व्रत” कहते हैं। संध्याकाल का समय अर्थात सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय “प्रदोष काल” कहलाता है। मान्यता है कि प्रदोष काल के समय महादेव शिव शंकर अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। प्रदोष व्रत मुख्यतः संतान प्राप्ति की कामना से किया जाता है किंतु भगवान आशुतोष की ऐसी महिमा है कि कलयुग में जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है। हिन्दुबुक के पन्नो से आज हम अपने पाठकों के लिए प्रदोष व्रत की महिमा व व्रत की कथा लेकर आए है।

प्रदोष व्रत का विधि-विधान :

प्रदोष व्रत के पूजन का कोई विशेष विधान नही है। इस व्रत को स्त्री पुरुष दोनों ही कर सकते है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। व्रत करने वाले को प्रात:काल स्नान करके “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए, दूध-दही-जल आदि से “शिवलिंग” का अभिषेक करना चाहिए, तत्पश्चात बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्य, दक्षिणा आदि श्रद्धानुसार भगवान शिव को अर्पण कर पूजन अर्चन करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। पूजन के बाद प्रदोष व्रत की कथा सुननी चाहिए, कथा सुनने के बाद भगवान शिव की आरती करनी चाहिए। व्रत के दिन एक समय ही भोजन करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को अक्षय पुण्य लाभ मिलता है।

प्रदोष व्रत की कथा :

प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी हुआ करता था। पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगा करती थी। एक दिन उसे वन में विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जो अपने पिता की मृत्यु के बाद मारा मारा भटक रहा था। ब्राह्मणी उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और अपने पुत्र जैसा रखने लगी।

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने दोनों पुत्रों को लेकर “शांडिल्य ऋषि” के आश्रम में गई। वहां उसने ऋषि से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी।

एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे। उनमें से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परंतु राजकुमार वन में ही रह गया। उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करने लगा। उस कन्या का नाम अंशुमती था। उस दिन वह राजकुमार घर देरी से लौटा।

राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता के साथ बैठी थी। अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उन्होंने कहा कि भगवान शिवजी की आज्ञा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है। राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे दी तो उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

बाद में राजकुमार ने गंधर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर आक्रमण किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगा। वहां उस महल में वह पुजारी की पत्नी और उसके पुत्र को आदर के साथ ले आया तथा साथ रखने लगा। पुजारी की पत्नी तथा पुत्र के सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का कारण और रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अंशुमती को प्रदोष व्रत की महिमा से अवगत कराया, उसके बाद दोनो पति पत्नी साथ मे प्रदोष व्रत करने लगे।

जो भक्त प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती। उसके जीवन के सभी कष्ट अपने आप ही दूर होते जाते हैं, भोलेनाथ उनके जीवन पर समस्या के बादल नहीं आने देते।

कथा सुनने के बाद भगवान की आरती करना आवश्यक है, यहाँ क्लिक कर पढ़े भगवान शिव की आरती 

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