पढ़िए भगवान शिव के नीलकण्ठ बनने की कथा

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देवता और असुर मिलकर जब समुद्रमन्थन कर रहे थे, तब मन्थन करते करते अचानक समुद्र से “कालकूट” की अत्यंत भयंकर विषाग्नि प्रकट हो गई। विष की विषाग्नि से सारे जलचर जलने लगे, देवता घबरा गए, दैत्य भयभीत हो गए। भगवान विष्णु ने कहा, “घबराने की कोई बात नही है, सारा विष इकठ्ठा करो और चलो भोलेनाथ की शरण मे।” वही है जो इस समस्या का समाधान कर सकते है।

घबराए हुए सभी देवता और असुर जहर को एक घड़े में भरकर भगवान शिव की शरण मे पहुँचे और उनसे प्रार्थना की- “हे देवाधिदेव महादेव! त्रैलोक्य को भस्म करने वाली भयंकर विषाग्नि वाले इस कालकूट विष से हमारी रक्षा करें।”

भोलेनाथ ने माता पार्वती की ओर देखकर कहा, ” देखिए भवानी! ये सब हमे विष पिलाना चाहते है, बोलो क्या किया जाए?” माता ने हाथ जोड़ कर कहा कि प्रभु! जिसमे सबका कल्याण हो वही कीजिए। बाबा ने कहा, सबका कल्याण तो इसी में है कि इस जहर को हम ही पी ले। लाओ भाई देवताओं, पिलाओ जो पिलाने लाए हो।

भोले बाबा ने अंजुली में भरकर सारा जहर मुख के भीतर कर लिया, और तभी उन्हें ध्यान आया कि मेरे हृदय में तो राम बसते है और रामजी के हृदय में अनंत कोटि ब्रह्माण्ड। अगर विष गले से नीचे उतरकर हृदय में चला गया तो मेरे प्रभु को बड़ा कष्ट होगा, प्रभु को कष्ट होगा तो समस्त संसार को कष्ट होगा। तो क्या करूँ? वमन कर दूँ? लेकिन वमन कर दिया तो संसार समाप्त, गटक लिया तो प्रभु को कष्ट। धर्मसंकट में भोले बाबा ने राम नाम का ही सहारा लिया। “रा” कहकर मुँह खोला, सारा जहर मुख में स्थित करके “म” कहकर मुख बंद कर लिया और राम नाम के बीच मे सारा जहर अपने कंठ में धारण कर लिया।

कर्पूरगौरं- अर्थात कपूर की तरह गोरे थे भगवान शिव, विष के प्रभाव से भगवान शम्भू का कंठ नीला पड़ गया, तबसे भोले बाबा का एक नाम “नीलकंठ” हुआ।

“कर्पूरगौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारं”

भगवान शिव जो साक्षात करुणावतार है, समस्त संसार के सारभूत भगवान शिव है, मूर्तिमन्द करुणा के अवतार है, संसार का संकट टालने के लिए स्वयं विषपान कर लेते है, इसीलिए अमृत पीने वाले देव कहलाए, और विष पीने वाले “महादेव” कहलाए। जो समाज के संकट को अपने सर पर ले, वही तो समाज का सबसे बड़ा “शिव” है, संसार के कल्याण की कामना करने वाला वही तो “शंकर” है, सभी की करुणा को हरने वाले वही तो “करुणावतार” है।

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एक बार आंक, धतूरा समेत तमाम विषैले फूल रोते हुए भगवान शिव के पास पहुंचे और अपनी करुणा बताई की किसी भी देवता की पूजा में हमारा उपयोग नही होता, हम सब बड़े उपेक्षित महसूस कर रहे है। भोले बाबा ने कहा, जो किसी के काम का नही वो हमारे काम का, आ जाओ हमारे पास, हम स्वीकार करते है तुम्हे।

ऐसे ही एक बार साँप बिच्छु समेत तमात विषैले जीव जंतुओ ने भोले बाबा से शिकायत की, बाबा हमारे मुख में जहर है, आपके भी तो कंठ में जहर है, इसीलिए आपकी तो सब पूजा करते है और हमे तो कोई देखना भी नही चाहता, गलती से किसी को दिख जाए तो हमारा मुंह कुचल कर मार डाला जाता है, अब बताइये हम क्या करें, कहाँ जाएं? भोले बाबा ने उनको भी अपनी शरण मे लेकर अपने शरीर पर आभूषण बना कर सजा लिए। भुजंगो को अपने गले का हार बना हृदय से लगाकर भोलेनाथ “भुजगेन्द्रहारं” हो गए।

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ऐसे ही एक बार तमाम भूत पिशाच भोले नाथ के पास पहुंचकर कहने लगे, बाबा! कोई हमे अपने घर घसने नही देता, लोग बोतलों में बंद कर समुंदर में फिंकवा देते है। भोले बाबा ने उन सब को न केवल अपने घर मे शरण दी, बल्कि अपनी बारात में बाराती बना कर भी ले गए। भोले बाबा अपनी बारात में बैल पर बैठकर जा रहे थे, पीछे सब भूतप्रेत गण नृत्य कर रहे थे, किन्तु उनके मन मे एक कसक थी कि भोले बाबा हमारा नृत्य नही देख पा रहे क्योंकि हमारे तरफ तो उनकी पीठ है, और उनके आगे जाकर नाचेंगे तो मर्यादा के विपरीत होगा। भोले बाबा उनकी मंशा समझ गए और बैल की पूँछ की तरफ मुँह करके बैठ गए।

अब कल्पना कीजिए उस दूल्हे की जो बैल पे उल्टा बैठकर अपनी बारात ले जा रहा हो। ऐसे ही है हमारे करुणावतार भूतभावन भगवान शिव, जो संसार के कल्याण के लिए विषपान करने से भी पीछे नही हटे, जो स्वयं मरघट में रहे और अपने भक्त को सोने के महल में रखें, ऐसे करुणावतार तो केवल हमारे “भोलेनाथ” ही हो सकते है।

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