क्यों मनाई जाती है नागपंचमी, जानिए पौराणिक महत्व

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प्रकृति हमेशा से मनुष्यों को कुछ न कुछ देती ही आई है, और बदले में हमसे कभी कुछ नही मांगती, लेकिन ये हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम प्रकृति की रक्षा करें, उसका संरक्षण करें। हिन्दू समाज हमेशा से ही प्रकृति पूजक रहा है। पीपल, तुलसी, वट, आँवला आदि की पूजा करके हम पेड़-पौधों और वृक्षों को पूजते आए है। गोवर्धन पर्वत के रूप में हम पर्वत और पहाड़ों को पूजते आए है। गंगा-यमुना-सरस्वती के रूप में हम नदियों को पूजते आए है। गाय को माता मानकर हम पशुओं को पूजते आए है, तथा “नागपंचमी के दिन नागदेवता” को पूजकर हम सरीसृप प्रजाति के जीवों को पूजते है। प्रकृति के विभिन्न प्रजातियों को हम ऐसे ही नही पूजते, बल्कि हर एक कि पूजा के पीछे कोई न कोई कारण भी अवश्य होता है। “हिन्दुबुक” के पाठकों को आज हम बताएंगे कि हम नाग और सर्पो को क्यों पूजते है और “नागपंचमी” क्यो मनाई जाती है।

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, महाराज परीक्षित को शमीक मुनि के पुत्र ने श्राप दिया था कि- “सात दिनों के पश्चात तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी”। महाराज परीक्षित ने तत्काल राज पाट और मोह माया त्याग कर सात दिनों तक शुकदेवजी द्वारा भागवत कथा का विधिपूर्वक श्रवण किया, और ठीक सातवे दिन तक्षक नाग के दंश से उनकी मृत्यु हो गई।

महाराज परीक्षित के पुत्र महाराज जनमेजय अपने पिता की इस तरह मृत्यु होने से काफी दुखी हुए, क्रोध में भरकर उन्होंने समूची सर्प जाती के विनाश का संकल्प ले लिया। अपने संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने “सर्पाहुति” यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के होता ब्राह्मणों द्वारा एक एक सर्प और नागों का आव्हान कर उनकी आहुतियां दी जाने लगी। इस यज्ञ के प्रभाव से जिस भी सर्प के नाम का आव्हान किया जाता, वह सर्प अपने आप ही आकर यज्ञ की अग्नि में प्रविष्ट हो जाता। इस यज्ञ से सर्प जाती पर बड़ा संकट आ गया था। सृष्टि का संतुलन बने रहने के लिए भी यह आवश्यक है कि इसमें रहने वाली सभी प्रजातियों का अस्तित्व उचित मात्रा में बना रहे।

यज्ञ के अंत मे यज्ञ के ब्राह्मणों ने “तक्षक” नाग का आव्हान किया। तक्षक अपने प्राण बचाने “देवराज इंद्र” की शरण मे आया और इन्द्र ने उसे शरण दी और तक्षक इन्द्रासन के पाये से लिपट गया। तब यज्ञ के ब्राह्मणों ने इन्द्र सहित तक्षक का आव्हान किया, मन्त्रो के प्रभाव से इन्द्रासन पर विराजमान इन्द्र और इन्द्रासन के पाये से लिपटा हुआ तक्षक, दोनो ही यज्ञस्थल तक खींचे चले गए।

तब इन्द्र और तक्षक दोनो की रक्षा हेतु तक्षक नाग के भांजे और ऋषि जरत्कारु और माता मनसा देवी के पुत्र ऋषि “आस्तिक” से विनती की गई की वे महाराज जनमेजय के पास जाकर उन्हें समझाएं और सर्पाहुति यज्ञ को बन्द कराएं।

आस्तिक ऋषि महाराज जनमेजय के पास गए और उनके कुल का बड़ा ही मधुर वर्णन करने लगे। अपने कुल की महानता का वर्णन सुनकर महाराज जनमेजय बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने आस्तिक ऋषि से कहा कि- “मुनिश्रेष्ठ! बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ”।

आस्तिक ऋषि ने कहा- “महाराज जनमेजय! आपकी कीर्ति सुनकर हम यहाँ दान प्राप्त करने की आशा से आए है”। महाराज जनमेजय ने वचनबद्ध होकर ऋषि आस्तिक से मनचाहा दान मांग लेने को कहा। ऋषि आस्तिक ने जनमेजय को प्रकृति के संतुलन के लिए प्रत्येक जीव की उपयोगिता का महत्व समझाते हुए उनसे सर्पाहुति यज्ञ को रोक देने के लिए कहा। महाराज जनमेजय को आस्तिक ऋषि की सारी बाते समझ आ गई और वे अपने वचन से भी बन्धे हुए थे, इसीलिए उन्होंने तत्काल सर्पाहुति यज्ञ बन्द कर दिया। इस तरह तक्षक के साथ समूची सर्प प्रजाति की रक्षा हुई।

नागराज तक्षक ने अपने भांजे ऋषि आस्तिक से वर मांगने के लिए कहा। ऋषि आस्तिक ने कहा कि सर्प प्रजाति बिना कारण प्रकृति के अन्य जीवों पर हमला न करे और उन्हें किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाए। तक्षक ने यह वचन दिया और साथ ही यह वचन भी दिया कि जो भी मनुष्य ऋषि आस्तिक का स्मरण करेंगे उन्हें सर्पो से किसी भी तरह का भय नही होगा।

तभी से यह कहा जाता है कि- जो भी मनुष्य अगर कभी किसी सर्प के सम्मुख पड़ जाए तो मन ही मन ऋषि आस्तिक का स्मरण करते हुए अपने मुख से यह वचन कहे कि- “हे सर्पराज! आपको ऋषि आस्तिक की आन है, आप यहाँ से प्रस्थान कर मुझे भयमुक्त करें“। तो वह सर्प बिना कोई हानि किए आपके सामने से चला जाएगा।

जिस दिन सर्पाहुति यज्ञ बन्द हुआ, तक्षक की रक्षा हुई और तक्षक ने ऋषि आस्तिक को वरदान दिए थे उस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की “पंचमी” तिथि थी, इसीलिए प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को “नागपंचमी” मनाई जाती है, और हम सर्पो से अपने और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करते है।

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