कथा चक्रवर्ती सम्राट मान्‍धाता की जिनका जन्म अपने पिता के गर्भ से हुआ था

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मित्रों, हमारे प्राचीन भारत का विज्ञान आज की तुलना में कई गुना ज्यादा उन्नत था, लेकिन हमने हमेशा ही वेद पुराणों का मज़ाक उड़ाया, कुछ तो यहाँ तक कहते है कि हमारे धर्मग्रंथ अफीम चाट कर लिखे गए थे। आज विज्ञान नित नई तकनीकें खोज रहा है, कई सारी असामान्य चीजे वास्तव में हो रही है जिनका उल्लेख हज़ारों वर्षों पूर्व लिखे गए हमारे धर्मग्रंथों में पहले से ही है। लेकिन आज से 100-150 साल पहले तक हम इनको गप्प मानते थे, लेकिन आज वह सब चीजें घटित हो रही है क्योंकि विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और मूल घटनाओं से मिलती जुलती चीजे आज साकार हो रही है। आज जब हम लोग विज्ञान के चमत्कार को स्वीकार कर रहे है, तब हमें यह मानना ही होगा कि अवश्य ही हमारे ऋषि मुनियों ने भी चमत्कार किए होंगे। आज हम आपको ऐसी ही एक वैज्ञानिक तकनीक के पौराणिक प्रमाण के बारे में बताएंगे। आधुनिक युग के शल्य प्रसव अथवा सिजेरियन डिलीवरी के बारे में तो सभी जानते है, लेकिन क्या आप जानते है हमारे पुराणों में पहले से ही इस तरह के प्रमाण है जहाँ किसी बच्चे का प्रसव शल्य चिकित्सा या ऑपरेशन द्वारा किया गया था, वो भी एक पिता की कोख से:

सूर्यवंश में प्रकट हुए भगवान श्रीराम इक्ष्वाकु वंशीय थे, उनके जन्म से कई पीढ़ियों पहले इसी सूर्यकुल में एक बड़े प्रतापी राजा इक्ष्वाकु हुए थे जिनके नाम से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु वंश में एक राजा हुए थे जिनका नाम था – “युवनाश्व”। महाराज युवनाश्व भी परम प्रतापी राजा थे, अयोध्या उनकी राजधानी थी। उनके रहते उनके राज्य में प्रजा को किसी वस्तु की कोई कमी नही रहती थी। कमी थी तो बस एक बात की- महाराज युवनाश्व के कोई संतान नही थी। राज्य के पास कोई उत्तराधिकारी नही था। सूर्यवंश के आदिगुरु “महर्षि वशिष्ठ” ने राजा को पुत्र प्राप्ति के लिए “पुत्रकामेष्टि” यज्ञ करने की सलाह दी। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। महामुनि च्यवन इस यज्ञ के होता थे। कई दिनों तक यह यज्ञ चलता रहा। यज्ञ के बाद महामुनि च्यवन ने एक कलश में जल को अभिमंत्रित कर रखा हुआ था जिसको पीने से महाराज युवनाश्व की पत्नी गर्भधारण करती। यज्ञ के बाद सभी ऋषि मुनि व अन्य सहायक गण थकान से चूर होकर गहरी निद्रा में सो गए थे। रात्रि में राजा को प्यास लगी, उन्होंने कई बार सेवको को आवाज दी, लेकिन गहरी नींद में सोते रहने से किसी ने भी उनको पानी नही दिया। अंत मे राजा स्वयं ही पानी ढूंढने लगे, राजा की नज़र उसी कलश पर पड़ी जिसमे रानी के लिए अभिमंत्रित जल रखा हुआ था। राजा को यह बात पता नही थी कि यह अभिमंत्रित जल है, और इसे पीकर रानी गर्भाधान करेगी। इस बात से बेखबर तृष्णा के वशीभूत होकर राजा ने वही जल पी लिया और सो गए।

सुबह उठकर जब च्वयन ऋषि ने कलश देखा तो उसे खाली पाया। वो सबसे पूछने लगे कि इस कलश का पानी कहाँ गया। तब राजा ने बताया कि वह पानी तो उन्होंने रात्रि में पी लिया। च्वयन मुनि तो अपना माथा पकड़ कर बैठ गए। उन्होंने राजा से कहा कि ये आपने क्या कर दिया महाराज। यह अभिमंत्रित जल था जो रानी को पीना था जिससे वो गर्भाधान कर पाएं, क्योंकि हमने रानी की नाड़ी जाँच से यह जान लिया था कि रानी का गर्भाशय पूर्ण विकसित नही है, और इसीलिए हमने यह जल अनेक जड़ी-बूटियों के सत्व से बनाकर इसे अपने मन्त्रो से अभिमंत्रित किया था ताकि इसे पीकर महारानी का गर्भाशय पूर्ण विकसित हो जाए और वो गर्भाधान कर पाए। अब महाराज युवनाश्व ने हाथ जोड़कर पूछा कि, “हे महामुनि! अब क्या होगा? च्वयन मुनि ने कहा कि- राजन! हमारे मन्त्रो का प्रभाव खाली नही जा सकता। अब आपके उदर में ही बाएं भाग में एक गर्भाशय विकसित होगा और आपके शुक्राणुओं के निषेचन से आपका पुत्र आपके ही उदर से जन्म लेगा।

जब संतान के जन्म लेने का समय आया तब देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों ने राजा युवनाश्व की बाईं कोख से शल्यक्रिया (ऑपरेशन) द्वारा पुत्र का जन्म करवाया। सम्भवतः यह विश्व मे पहली घटना थी जब एक पिता के गर्भ से उसकी संतान का जन्म हुआ हो, साथ ही पेट काटकर ऑपरेशन द्वारा बच्चे की डिलीवरी करवाने का भी यह पहली घटना थी। बच्चे का जन्म तो सफलतापूर्वक हो गया था लेकिन अब समस्या आई कि बच्चे का लालन पालन कैसे हो? उसके लिए माँ के दूध की व्यवस्था कैसे होगी? यह समस्या देवराज इंद्र ने दूर कर दी। इस चमत्कार को देखने के लिए समस्त देवता आए हुए थे, तभी इंद्र ने अपनी तर्जनी उंगली बच्चे के मुख में देते हुए कहा- “माम् धाता” अर्थात माँ के दूध के अभाव में मैं तुझे धारण करता हूँ, और इस कर्तव्य को मैं पूरा करूँगा। देवराज इंद्र की उस तर्जनी उंगली में अमृत का अंश था, जिसे पीकर बच्चा शीघ्र ही हष्ट पुष्ट होता गया। इंद्र के “माम धाता” कहने के कारण बच्चे का नाम “मान्धाता” हुआ।

देवताओं की देखरेख में ही बालक की शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुई। समय आने पर महाराज युवनाश्व ने अपना समस्त राजपाट मान्धाता को सौंप दिया। ये भी अपने पिता की तरह बड़े ही शूरवीर और प्रतापी राजा हुए। इन्होंने अपने बाहुबल से समस्त पृथ्वी को जीत लिया था। इन्होंने अपने शौर्य से रावण तक को युद्ध मे पराजित कर दिया था। समस्त पृथ्वी को जीतकर महाराज मान्धाता को अभिमान हो गया और उन्होंने स्वर्गलोक पर ही चढ़ाई कर दी। देवराज इंद्र ने कहा कि अभी धरती पर मथुरा का राजा “लवणासुर” बचा है जिसे आपने पराजित नही किया, पहले उसे युद्ध मे जीतिए तत्पश्चात स्वर्ग पर चढ़ाई करिए। अभिमान में भरे मान्धाता ने अकेले ही लवणासुर पर चढ़ाई कर दी। लवणासुर के पास भगवान शिव का दिया हुआ एक त्रिशूल था जिसके पास रहते विश्व मे कोई भी उसे हरा नही सकता था। लवणासुर ने इसी त्रिशूल से मान्धाता का वध कर दिया। कालांतर में इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न ने लवणासुर का अंत कर मथुरा पर राज्य किया।

भारतवर्ष का समस्त कोली समाज आज भी महाराज मान्धाता को ही अपना इष्टदेव मानता है।

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