अभिमन्यु पुत्र महाराज परीक्षित की कथा: किसने दिया था महाराज परीक्षित को श्राप

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पांचों पाण्डवो के स्वर्गलोक की महायात्रा पर प्रस्थान करने के बाद अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र, “महाराज परीक्षित” हस्तिनापुर के राजा बने। सदैव धर्म के मार्ग पर चलने वाले महाराज परीक्षित ने अपने अपने पराक्रम से पूर्वजों की कीर्ति को और भी उज्ज्वल किया। उनके राज्य में कोई भी दुखी नही था, प्रजा सुखपूर्वक रहती थी।

एक दिन महाराज परीक्षित नगर भ्रमण के लिए निकले, घूमते फिरते वे वन की ओर निकल गए। वहाँ उन्होंने एक अजीब दृश्य देखा। एक दुष्ट आदमी एक गाय और एक बछड़े को मार रहा था, बछड़े के तीन पैर टूट चुके थे, एक पैर पर रेंग रेंग कर चल रहा था। परीक्षित ने जब यह दृश्य देखा तो आगबबूला हो गए। इस दुष्ट की मेरे राज्य में गौमाता पर प्रहार करने की हिम्मत कैसे हुई? राजा ने अपने शस्त्र सम्भाल लिए और दुष्ट की ओर प्रहार करने भागे। वह दुष्ट आदमी त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए महाराज परीक्षित की शरण मे आ गया। क्षत्रिय का धर्म है कि शरण मे आए हुए पर प्रहार नही करते। परीक्षित ने उन तीनों से उनका परिचय पूछा। गाय ने कहा कि महाराज, मैं धरित्री (धरती माँ) हूँ, बछड़ा बोला- मैं धर्म हूँ। दुष्ट ने कहा- महाराज, मैं हूँ कलयुग। महाराज परीक्षित ने कहा- “अरे दुष्ट कलयुग! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे राज्य में प्रवेश करने की? तू मेरी शरण न आया होता तो अभी तेरा वध कर देता। तू इसी क्षण मेरे राज्य से निकल जा।”

कलयुग ने कहा- “महाराज! सप्त द्वीप वसुन्धरा पर आपका ही एकछत्र अधिकार है। मैं जाऊँ तो जाऊँ कहाँ? आप ही कोई स्थान बता दीजिए।” तब महाराज परीक्षित ने उसे रहने के लिए 5 स्थान दिए। जहाँ जुआ खेला जाता हो, जहाँ मदिरापान किया जाता हो, जहाँ भाई बांधवों में झगड़ा होता हो, जहाँ जीव जंतुओं की हत्या होती हो और पापकर्म से कमाए गए स्वर्ण (धन-संम्पति) यह 5 स्थान महाराज परीक्षित ने कलयुग को निवास के लिए दिए। कलयुग महाराज परीक्षित को प्रणाम कर चला गया।

एक दिन महाराज परीक्षित आखेट पर जाने वाले थे। जाते समय उन्होंने जो स्वर्ण मुकुट पहना था वो महाबली भीम ने जरासन्ध से जीत कर लाया था। जरासन्ध एक अत्याचारी राजा था, पापकर्मो में उसकी रुचि थी। वह स्वर्णमुकुट भी पापकर्म की कमाई का था, इसीलिए उसमे कलयुग का निवास था। महाराज परीक्षित स्वर्णमुकुट में कलयुग को सर पे बिठाए वन में चले गए। वन में घूमते घामते राजा को भूख प्यास लगी, भटकते हुए राजा शमीक मुनि के आश्रम में पहुंचे। आश्रम में पहुंचकर देखा कि शमीक मुनि ध्यान लगा कर बैठे थे। कलयुग सर पे बैठा था तो राजा को ये भ्रम हो गया कि मुझे देखकर यह साधु बाबा जानबूझकर आंखे बन्द कर ध्यान लगा कर बैठ गया ताकि मेरी सेवा-आवभगत न करनी पड़े। महाराज परीक्षित ने देखा कि पास ही एक मरा हुआ सर्प पड़ा है, महाराज ने तीर से उस सर्प को उठाकर शमीक मुनि के गले मे डाल दिया और चले गए।

गुरुकुल के कुछ बालकों ने यह दृश्य देखा तो दौड़कर शमीक मुनि के पुत्र के पास गए और सारा वृत्तांत कह सुनाया। उस समय वह मुनिकुमार कौशिकी नदी के किनारे अन्य बालकों के साथ खेल रहा था, अपने पिता के अपमान का समाचार सुना तो क्रोध से भर उठा, कौशिकी नदी का जल हाथ मे उठाकर श्राप दे दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नाग के काटने से महाराज परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। शमीक मुनि को जब यह पता चला तो बड़े नाराज हो गए, पुत्र को समझाया कि- “हमें क्रोध शोभा नही देता है। राजा परीक्षित और उनके कुल ने सदैव ही हम ब्राह्मणों की सेवा सुश्रुषा की है, भूखे प्यासे राजा हमारे आश्रम में आए थे, स्वागत सत्कार तो कुछ हुआ नही उल्टे श्राप और ले गए। ऐसा धर्मात्मा राजा अब इस भारत भूमि को दुबारा नही मिलेगा।” गुरुजी ने आश्रम से एक बालक से कहा कि जल्दी से राजमहल जाओ और राजा को इस श्राप के बारे में बताओ। राजा को जब सारी बातें पता चली तो अपनी करनी पर बड़ा पछतावा हुआ। सोचने लगे कि ये मुझसे कितना बड़ा पाप हो गया, मेरे पूर्वजो की कीर्ति को यह कैसा कलंक लगा दिया मैंने। मैंने और मेरे पूर्वजो ने सदैव ही ब्राह्मणों की सेवा पूजा की है, आज ये मुझसे कैसा पाप हो गया। अब मुझे एक क्षण भी जीवित रहने का अधिकार नही है, लेकिन ब्राह्मण कुमार ने भी सात दिन बाद मृत्यु का श्राप दिया है।

महाराज परीक्षित ने विचार किया कि अब मेरे पास केवल सात दिवस है, अब इस शरीर से एक क्षण भी राजमहल के सुख नही भोगूँगा। महाराज परीक्षित ने अपने पुत्र जनमेजय को सारा राजपाट दे दिया, और सन्यास ग्रहण कर वन में चले गए। परम भागवत शुकदेवजी महाराज ने स्वयं अपने मुखारविंद से महाराज परीक्षित को मोक्ष प्राप्ति हेतु सात दिवस तक श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का मधुर श्रवण करवाया। सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से महाराज परीक्षित की आत्मा उनकी देह से मुक्त हुई, श्रीहरि के पार्षद दिव्य विमान से उन्हें अपने साथ बैकुंठ लोक ले गए।

अपने पिता की मृत्यु से महाराज जनमेजय अत्यंत क्षुब्ध हो गए, उन्होंने समूल सर्पजाति के विनाश के संकल्प से सर्पाहुति यज्ञ का आयोजन किया, जिसकी कथा हम आपको पहले ही एक अन्य पोस्ट के माध्यम से बता चुके है।

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