जयद्रथ वध : जब अर्जुन ने लिया अभिमन्यु की मृत्यु का बदला

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सिंधु राज्य के नरेश राजा वृद्धक्षत्र के राज्य में किसी प्रकार की कोई कमी नही थी, सिवाय राज्य के उत्तराधिकारी के। देवताओं की मान मनौतियों, यज्ञ हवन, धर्म कर्म, दान दक्षिणा और वृद्धक्षत्र के पूर्वजो के पुण्य प्रताप से आखिर वृद्धक्षत्र के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ, नाम रखा गया – “जयद्रथ।” जयद्रथ के पिता अपने पुत्र से बड़ा स्नेह रखते थे, उन्होंने जयद्रथ को वरदान दिया था कि जो भी कोई जयद्रथ का सर भूमि पर गिराएगा उसके सर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। समय आने पर वृद्धक्षत्र ने परंपरानुसार सन्यास ग्रहण किया और जयद्रथ बने “सिंधुनरेश”। जयद्रथ का विवाह दुर्योधन की बहन “दुशला” से हुआ था।

महाभारत का युद्ध चल रहा था। जयद्रथ और सिंधु राज्य की सेना कौरव पक्ष की ओर से युद्ध कर रहे थे। गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव पक्ष का विनाश करने के लिए चक्रव्यूह निर्माण की योजना बनाई थी जिसमे फँसकर सारी पांडव सेना नष्ट हो जाती, लेकिन अर्जुन के रणभूमि में रहते ऐसा सम्भव नही था। अर्जुन एकमात्र योद्धा था जो चक्रव्यूह भेदन जानता था, इसीलिए द्रोणाचार्य और कौरव पक्ष की पूर्व निर्धारित योजनानुसार पहले तो अर्जुन को रणभूमि से दूर कर दिया गया, पश्चात चक्रव्यूह का निर्माण किया गया। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु जो चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर सकता था लेकिन बाहर निकलना नही जानता था, बावजूद इसके सारी सेना का विनाश टालने के लिए उस बालक ने चक्रव्यूह भेदन का निश्चय किया और “एक जान के बदले सारी सेना का विध्वंस होने से बच जाएगा” ऐसा कहकर सम्राट युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर चक्रव्यूह में घुस गया। चक्रव्यूह के 6 चक्र सफलतापूर्वक भेदने के बाद 7वें और अंतिम चक्र में उसका सामना दुर्योधन, कर्ण, अश्वत्थामा, दुशासन, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य एवं जयद्रथ जैसे योद्धाओं से हुआ। सारे योध्या उस बालक पर एक साथ टूट पड़े, अभिमन्यु बड़ी वीरता से सबका सामना कर रहा था किंतु अधर्म की पराकाष्ठा तो तब हुई जब जयद्रथ ने पीछे से अभिमन्यु पर वार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी।

संध्या को जब अर्जुन रणभूमि में लौट कर आए, अपने पुत्र की निर्मम हत्या का समाचार सुना तो क्रोध से भर उठे। प्रण कर लिया कि कल सूर्यास्त के पूर्व यदि जयद्रथ का वध नही किया तो स्वयं अग्निस्नान कर लेंगे। जयद्रथ ने जब यह प्रण सुना तो भागा भागा दुर्योधन के पास गया। कौरव सेना के महारथियों ने योजना बनाई की कल सारे योध्या केवल और केवल जयद्रथ की ही रक्षा करेंगे। अगले दिन जब युद्ध शुरू हुआ तो जयद्रथ और दुर्योधन सेना के सबसे पिछले हिस्से में थे। अर्जुन एक एक महारथी से युद्ध करता रहा लेकिन जयद्रथ तक पहुंच नही पा रहा था। तब कृष्ण ने अपनी माया रची। बादलों से सूर्य को ढँककर सूर्यास्त का आभास करवा दिए। जयद्रथ और दुर्योधन ने देखा कि सूर्यास्त हो चुका है तो खुशी से पागल हो गए। अर्जुन को अग्निस्नान करता देखने के लिए दोनो ही अपना सुरक्षा घेरा तोड़कर सेना के अगले हिस्से में आ गए और अट्ठहास करने लगे। तभी कृष्ण ने अपनी माया समेट ली, सूर्य फिर प्रकट हो गए। कृष्ण ने अर्जुन से कहा- “बिना एक भी क्षण गंवाए भगवान शिव के दिए हुए पाशुपतास्त्र का संधान करो और जयद्रथ का अंत कर दो किन्तु ध्यान रहें, अगर तुम्हारे द्वारा इसका सर भूमि पर गिरा तो तुम भी नही बचोगे और तुम्हारे सर के 100 टुकड़े हो जाएंगे। यहाँ से उत्तर दिशा में एक सौ योजन की दूरी पर वन में इसके पिता तप कर रहे है, तुम इस प्रकार बाण चलाओ की इसका सर अपने पिता की गोद मे जा गिरे।”

भगवान कृष्ण के कहे अनुसार अर्जुन ने पाशुपतास्त्र का आव्हान कर जयद्रथ पर छोड़ दिया। पाशुपतास्त्र जयद्रथ के सर को काटकर उसके पिता वृद्धक्षत्र की गोद मे छोड़ आया। वृद्धक्षत्र ने जब अपने पुत्र का कटा सर अपनी गोद मे देखा तो चौंककर खड़े हो गए जिससे जयद्रथ का सर भूमि पर गिर गया और अपने ही दिए वरदान के फलस्वरूप वृद्धक्षत्र के सर के सौ टुकड़े हो गए।

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