जब भगवान श्रीकृष्ण रण छोड़ कर भागे, और नाम पड़ा रणछोड़

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भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के बारे में कौन नही जानता। वह भगवान श्रीहरि विष्णु के अवतार थे। अवतार लेने का उद्देश्य केवल कंस का अंत करना ही नही था, अवतार का उद्देश्य अपने पार्षद जय-विजय को श्रापमुक्त करना ही नही था, बल्कि अवतार का मुख्य उद्देश्य समाज मे नए आदर्श स्थापित करना था, रूढ़िवादी परम्पराओं को ध्वस्त कर नई परम्पराए शुरू करना था। उनकी कही बातों को समझ पाना आज भी सामान्य बुद्धि मनुष्य के लिए सम्भव नही है। धर्म रक्षा के लिए कई बार उन्होंने साम-दाम-दण्ड-भेद का भी सहारा लिया। वे सर्वशक्तिमान थे लेकिन फिर भी एक बार वे युद्धभूमि में युद्ध को बीच मे ही छोड़कर भाग गए थे, रण छोड़कर भागने के कारण ही उनका एक नाम “रणछोड़” भी हुआ। लेकिन जब वे भगवान थे तो उन्हें रण छोड़ कर भागने की क्या जरूरत थी? इसके पीछे भी एक रहस्य है, जिसके बारे में कम लोग ही जानते है। हमारे पाठकों के लिए “हिन्दुबुक” के पन्नों से आज हम लेकर आए है भगवान श्रीकृष्ण के “रणछोड़” बनने की कहानी:

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मामा “कंस” का वध कर मथुरा की प्रजा को उनके अत्याचारों से मुक्त कर दिया था। तत्पश्चात उन्होंने अपने नानाश्री और कंस के पिता महाराज “उग्रसेन” को पुनः मथुरा का राजा बनाया और उनके तथा अपने माता-पिता “देवकी और वसुदेव” के साथ मथुरा में ही निवास करने लगे। कंस का श्वसुर और मगध प्रदेश का राजा “जरासन्ध” कंस के वध से क्रोधित हो गया था और अपनी सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उसे पराजित कर दिया। इसके बाद जरासन्ध ने अनेक बार मथुरा पर आक्रमण किया लेकिन हर बार कृष्ण और बलराम की सेनाओं ने उसे पराजित कर वापस भेज दिया। बार बार की पराजय से जरासन्ध विचलित हो गया था, तब उसने अपने मित्र और यवन प्रदेश के राजा “कालयवन” से सहायता मांगी। कालयवन ने अपनी यवन सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण कर दिया। कालयवन को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि वो किसी भी अस्त्र शस्त्र से नही मरेंगे। भगवान श्रीकृष्ण तो सर्वज्ञ थे, उन्हें भगवान शिव के कालयवन को दिए वरदान के बारे में पता था। और इसीलिए वे जानते थे कि वो कालयवन का वध नही कर सकते, लेकिन उनके पास हर कार्य के लिए एक योजना थी। उन्हें पता था कि कालयवन की मृत्यु कैसे होगी, और इसीलिए वे कालयवन के साथ चल रहे युद्ध को बीच मे छोड़कर रणभूमि से भागने लगे।

कालयवन को यह भ्रम हो गया कि कृष्ण मुझसे डरकर भाग रहे है। इसीलिए वह भी कृष्ण के पीछे पीछे भागने लगा। भागते भागते कृष्ण एक गुफा के अंदर घुस गए, उस गुफा में त्रेतायुग के एक सूर्यवंशी राजा और पृथ्वी सम्राट मान्धाता के पुत्र “महाराज मुचकुन्द” गहरी निद्रा में सो रहे थे। एक बार देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था, उस युद्ध मे महाराज मुचकुन्द ने देवताओं की तरफ से युद्ध किया था। अनेक वर्षों तक वह युद्ध होता रहा, अंत मे देवताओं की विजय हुई और असुर पराजित हुए। युद्ध समाप्ति के उपरांत महाराज मुचकुन्द काफी थक गए थे, और वे लंबे समय तक सोना चाहते थे। इन्द्र ने उन्हें इस गुफा में जाकर विश्राम करने के लिए कहा, साथ ही यह वरदान भी दिया कि जो भी उन्हें निद्रा से जगाएगा उसपर महाराज मुचकुन्द की दृष्टि पड़ते ही वह तत्काल जलकर भस्म हो जाएगा। उसके बाद से ही महाराज मुचकुन्द उस गुफा में विश्राम कर रहे थे। जैसा कि हम पहले ही बता चुके है कि कृष्ण तो सर्वज्ञ थे, उन्हें यह बात भी पता थी।

रणभूमि से भागकर कृष्ण इसी गुफा में आ गए, और अपना पीताम्बर (कन्धे पर पहना जाने वाला एक वस्त्र) सो रहे महाराज मुचकुन्द को ओढ़ा दिया और एक जगह छुपकर कालयवन की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान कृष्ण के पीछे पीछे कालयवन भी इसी गुफा में आ गया। महाराज मुचकुन्द के ऊपर पड़े पीताम्बर को देखकर कालयवन को यह भ्रम हो गया कि कृष्ण मुझसे बचने के लिए यहाँ आकर सो गया है, अतः कालयवन ने कृष्ण समझकर महाराज मुचकुन्द को लात मारकर निद्रा से उठा दिया। निद्रा टूटते ही महाराज मुचकुन्द की दृष्टि कालयवन पर पड़ी और इन्द्र के दिए वरदान के प्रभाव से उनके नेत्रों से एक तेज क्रोधाग्नि निकली और देखते ही देखते कालयवन को भस्म कर दिया। इस चराचर जगत में जो कुछ भी होता है वह जगदीश्वर श्रीकृष्ण की ही इच्छा से होता है, अतः कालयवन का इस प्रकार अंत भी सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की ही इच्छा से हुआ था। रण छोड़कर भागना उन्ही की लीला का एक अंग था। इसके बाद संसार मे वे “रणछोड़” के नाम से भी विख्यात हुए।

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