कृष्ण तत्व और गोपी भाव

शेयर करना न भूलें :

कृष्ण तत्व क्या है? इसे समझना अत्यंत दुष्कर होकर भी अत्यंत सरल है। पुराणों में भगवान को रसस्वरूप कहा गया है। यदि श्रीमद्भागवत महापुराण एक फल है तो उस फल का रस “श्रीकृष्ण” है। उस रसस्वरूप परमात्मा का रसास्वादन ही “भक्ति” है। मनुष्य जन्म का लक्ष्य भी उस परम तत्व की प्राप्ति है, जिसे भक्ति मार्ग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति के भी अनेक मार्ग है। कोई निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करता है, तो कोई सगुण साकार परमात्मा की भक्ति करता है। मार्ग भिन्न भिन्न हो सकते है लेकिन मंजिल सबकी एक ही है। आप अपने हिसाब से मार्ग चुनने के लिए स्वतंत्र है। वृंदावन की गोपियों ने तो प्रेम मार्ग से भगवान को पाया है। प्रेम के आगे भगवान भी हार जाते है। एक बार उद्धव को जब अपने ज्ञान पर अहंकार हुआ तो भगवान ने उन्हें वृंदावन में गोपियों के पास भेजकर प्रेम भक्ति मार्ग का ऐसा दर्शन कराया कि उद्धव जी का सारा ज्ञान धरा का धरा रह गया। ऐसे ही एक बार नारद जी को भी गोपी भाव के दर्शन हुए थे। एक बार देवर्षि नारद आकाशमार्ग से जा रहे थे कि उनकी नज़र वृंदावन में जमना जी के किनारे वृक्ष के नीचे आंखे बंद कर ध्यानमुद्रा में बैठी हुई एक गोपी पर पड़ी।

ध्यानमग्न उस ब्रजबाला को देखकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने विचार किया कि संतजन जिस ध्यानगम्य श्रीकृष्ण का ध्यान लगाते है, वही श्रीकृष्ण वृंदावन में इन गोपियों के पीछे पीछे भागता है, एक मुट्ठी माखन के लालच में ठुमके लगा लगा कर नाचता है। जिस तत्व की एक झलक के लिए संत महात्मा कठोर तप करते है, साधना करते है। वही परम तत्व परमात्मा इन गोपियों के साथ रहता है तो फिर ये ब्रज बाला किसका ध्यान लगा रही है। नारद जी ने कहा चलो चल कर पता लगाया जाए।

 

जब उस ब्रज बाला के नेत्र खुले तो उसने अपने सामने नारद जी को खड़ा पाया। गोपी ने नारद जी को प्रणाम किया। नारद जी ने आशीर्वाद देते हुए पूछ ही लिया कि, देवी जी, किसका ध्यान लगा रही थी? भोली भाली गोपी ने कहा- “क्या बताऊँ महाराज! मुझे ध्यान व्यान लगाना कहाँ आता है। मैं तो किसी का ध्यान नही लगा रही थी। एक बड़ी विकट समस्या में उलझी हुई हूँ, आंखे बंद कर उसी समस्या का कोई समाधान ढूंढने की कोशिश कर रही थी।

नारद जी ने पूछा- कैसी समस्या?
गोपी ने कहा- समाधान बताओ तो समस्या बताऊँ!
नारद जी ने कहा- हाँ हाँ तुम अपनी समस्या तो बताओ, समाधान भी अवश्य बताएंगे।
गोपी ने कहा- महाराज! मेरी समस्या है वो नन्द का लाल।
नारद जी ने आश्चर्य चकित होकर पूछा- वो कैसे?
गोपी ने कहा- मुनिवर! वो नन्द का लाल मेरे चित्त से ऐसा चिपक गया है, की सारा दिन उसी की अनुभूति होते रहती है, उसके चक्कर मे घर का कोई काम नही हो पाता, जो काम करना भी चाहूं तो काम बिगड़ जाता है, काम बिगड़ता है तो मेरी सास मुझे हज़ार गालियां सुना देती है।

अब आज की ही बात है, मैं सुबह सुबह गाय दुह रही थी। इतने में नंदलाल वहाँ आ गया। मुझसे कहने लगा, “अरी गोपी, सारा दूध दुह लोगी क्या? मुझे नही पिलाओगी? मैं भी सुबह से भूखा ही डोल रहा हूँ, थोड़ा दूध मुझे भी पिला दो।” कन्हैया की मोहनी मूरत देखकर तो मैं बावरी सी हो गई। मैंने कहा, अरे कन्हैया तू भूखा है? चल अपना मुँह खोल, और मैंने सारा दूध बर्तन की जगह उसके मुँह में ही दुह दिया। मैं बड़ी प्रसन्नता से उसे दुग्धपान करा रही थी कि इतने में चिल्लाते हुए मेरी सास आ गई, तब मेरा ध्यान टूटा और मैंने देखा कि सारा दूध तो जमीन पर पड़ा है, वहाँ कोई नन्द का लाल नही है। वो तो केवल मेरे भावजगत का भावनात्मक कृष्ण था जो मेरे हृदय में ऐसे बसा हुआ है कि जब भी एकांत होता है वो मेरे सामने आ जाता है और मैं उससे बाते करने लग जाती हूँ।

उसके बाद मैं धान कूटने लग गई, जरा सा एकांत हुआ नही की फिर कृष्ण की मधुर खिलखिलाहट सुनाई दी। और मैं धान कूटना छोड़कर फिर उसी से बातें करने लग गई। सासू माँ फिर झल्लाकर बोली कि अरी बावरी, जो काम बताया वो तो किया नही और अकेले बैठे न जाने किससे बाते कर रही है। तब मेरी तन्द्रा भंग हुई और मैंने देखा की वहाँ तो कोई कृष्ण नही है।

और अभी थोड़ी देर पहले मैं मटकी लेकर जमना तट पर जल भरने गई थी। जल भरने के बाद आज मटकी इतनी भारी लगी कि मुझसे उठी ही नही। आस पास कोई दूसरी गोपी भी नजर नही आ रही थी कि उससे सहायता मांगू की इतने में उसी नटखट नंदलाल की मधुर वाणी कानों में सुनाई दी- “मैं मदद कर दूँ क्या?” मैं बोली, “अरे लाला, तू बड़े सही मौके पर आया है। आ ये मटकी उचाने में थोड़ा सहारा लगा दे।”

कन्हैया ने मटकी को हाथ लगाया, मैंने उसके सहारे के भरोसे जैसे ही मटकी उठाई, मटकी हाथों से छूट गई और नीचे गिर कर धम्म की आवाज के साथ टूट गई तब होश आया कि वहाँ तो कोई नन्द का लाल नही था। वो फिर से मेरी कल्पनाओं का कृष्ण था।

मुनिवर! मैं तो तंग आ गई हूँ इस कृष्ण से। जब तक इस कृष्ण को अपने चित्त से नही निकाल देती, तब तक घर का कोई काम नही कर पाऊंगी, इसीलिए यहाँ बैठकर यही सोच रही थी कि ये नंदलाल चित्त में बैठ तो गया है लेकिन अब निकलेगा कैसे! बहुत सोच लिया महाराज लेकिन कोई उपाय नही सूझा, अब आप ही कोई उपाय बताइये जिससे ये कृष्ण मेरे चित्त से निकल जाए और मैं शांति पाऊँ।

नारद जी तो सर पकड़ कर बैठ गए। हे भगवान! ऐसा विपरीत साधक तो आज पहली बार देखा है। आज तक जितने भी साधक मिले, सब मुझसे यही पूछते है की महाराज! प्रभु में ध्यान नही लगता कोई उपाय बताइये। घर छोड़ दिया, संसार छोड़ दिया, राख लपेट कर पंचाग्नि तप रहे है लेकिन ध्यान लगाते ही आंखों के सामने फिर संसार ही घूमने लगता है, यह चित्त प्रभु का ध्यान करता ही नही। सब यही पूछते है कि, इस चित्त से संसार कैसे निकले, माधव में मन कैसे लगे, और ये ब्रज बाला पूछ रही है कि उस चित्तचोर को हृदय से कैसे निकालूँ।

यही गोपी भाव है, यही प्रेम भाव है। संसार भर के साधक जिस परम तत्व परमात्मा की एक झलक प्राप्त करने के लिए न जाने कैसे कैसे प्रयत्न करते है, अष्टांग योग साधना करते है, भरी गर्मी में पंचाग्नि तपते है, शरीर को तमाम तरह के कष्ट देते है, विपरीत परिस्थितियों में दुष्कर साधना करते है और वही परम तत्व परमात्मा स्वयं इन ब्रज की गोपियों संग हास परिहास करते है। धन्य है ये ब्रजबाला जो उस चितचोर को हृदय से निकालने के प्रयास कर रही है, सांसारिक कर्मो में मन लगाना चाहती है लेकिन लगा नही पा रही है।

शेयर करना न भूलें :

Leave a Reply

You cannot copy content of this page