कहानी उस सम्राट ययाति की जिसके वंश में जन्मे थे श्रीकृष्ण, वह राजा जो शाप के कारण जवानी में ही हो गया था बूढ़ा

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श्रीमद्भागवत महापुराण में नवम स्कन्ध के अट्ठारवें अध्याय में “ययाति” चरित्र के बारे में विवरण है। चन्द्रवंश में एक राजा हुए थे जिनका नाम था- “नहुष”। राजा नहुष के छः पुत्र हुए जिनमे ययाति दूसरे नम्बर के पुत्र थे। सबसे बड़े पुत्र का नाम यति था वह बचपन से ही भगवद्भक्ति में लीन रहता था, सांसारिक मोह माया से वह सर्वथा विरक्त था। समय आने पर उसने राजा बनने से मना कर दिया और सन्यास लेकर वन को चला गया था, इसीलिए फिर “ययाति” को राजा बनाया गया। सम्राट ययाति एक बड़े ही परम प्रतापी राजा थे। उनका यश और कीर्ति दिग्दिगान्तर तक फैली हुई थी। उन्होंने अपने चारों छोटे भाइयों को भी चारो दिशाओं में राज्य करने भेज दिया था।

ययाति ने दो विवाह किए थे, “देवयानी” व “शर्मिष्ठा” से। देवयानी दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी और शर्मिष्ठा दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री थी। देवयानी के दो पुत्र हुए- यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा के तीन पुत्र हुए- द्रुह्यु,अनु और पुरु। स्वयं के दो पुत्र और शर्मिष्ठा के तीन पुत्र देखकर देवयानी को यह संदेह हुआ कि महाराज मुझसे अधिक शर्मिष्ठा को प्रेम करते है। एक बार देवयानी अपने पिता दैत्यगुरु शुक्राचार्य से मिलने उनके आश्रम आई। पिता ने कुशलक्षेम पूछा तो देवयानी ने ये बात अपने पिता से कह दी कि महाराज मेरी तरफ ध्यान ही नही देते, मेरी कोई परवाह नही करते और सारा समय शर्मिष्ठा के साथ ही व्यतीत करते है। वे मुझसे नही, शर्मिष्ठा से अधिक प्रेम करते है। दैत्यगुरु यह सुनकर क्रोध में आ गए। जब सम्राट ययाति देवयानी को लेने आए तब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने क्रोधवश सम्राट को वृद्ध हो जाने का श्राप दे दिया। अपने श्वसुर के श्राप के कारण सम्राट ययाति जवानी में ही बूढ़े हो गए। सम्राट ययाति ने दैत्यगुरु के चरण पकड़ लिए और श्राप से मुक्त कर देने की याचना करने लगे। ययाति ने कहा कि- “अभी मेरी विषयभोग की लालसा समाप्त नही हुई है, और इस श्राप से तो आपकी पुत्री की भी हानि है। मेरे वृद्धावस्था के कारण उसकी भी इच्छाएँ, कामनाएँ बूढ़ी हो जाएगी। कृपया मुझे श्रापमुक्त करें, और मैं वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री को कभी किसी शिकायत का अवसर नही आने दूँगा”। सम्राट के इन वचनों को सुनकर  दैत्यगुरु का क्रोध भी शांत हो चुका था। उन्होंने अपने दामाद से कहा- “पुत्र! मेरा दिया श्राप व्यर्थ तो नही जा सकता, लेकिन तुम्हारी विनती और आश्वासन सुनकर मैं इसमें इतना संशोधन अवश्य कर सकता हूं कि तुम किसी अन्य व्यक्ति से अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो। तुम किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढो जो स्वेच्छा से अपनी जवानी तुम्हे दे दे और तुम्हारा बुढ़ापा स्वयं धारण कर ले”।

ययाति अपने श्वसुर को प्रणाम कर देवयानी को साथ ले अपने महल में आ पधारे। उन्होंने अपने पांचों पुत्रो को बुलाकर सारी बात बताई और अपने पुत्रों से कहा कि अभी मेरी विषयभोग की लालसा खत्म नही हुई है। अतः तुमसे से कोई एक मेरा बुढापा ले लो और अपनी जवानी मुझे दे दो। ययाति के चार ज्येष्ठ पुत्रो ने तो साफ मना कर दिया, लेकिन सबसे छोटा पुत्र जिसका नाम “पुरु” था उसने अपने पिताजी से कहा- पिताजी! मेरा ये जीवन आपका ही दिया हुआ है, मेरा ये शरीर आपके किसी काम आए तो मैं इसे अपना सौभाग्य ही समझूंगा। आप खुशी से मेरी जवानी ले लीजिए और अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिए। राजा अपने छोटे पुत्र से बड़े प्रसन्न हुए, राजा ने अपना बुढ़ापा उसे दे दिया, उसकी जवानी ले ली और अपना समस्त राजपाट अपने छोटे पुत्र “पुरु” को सौप दिया और चारो बड़े पुत्रो को श्राप भी दिया कि तुम्हारे वंश में कोई चक्रवर्ती राजा जन्म नही लगा। इस प्रकार, पुरु बने सम्राट और राजा ययाति देवयानी संग विषयभोगो में लिप्त हो गए।

एक हज़ार साल तक राजा ययाति सांसारिक सुखों को भोगते रहे लेकिन उनकी लालसा खत्म ही नही हो रही थी। राजा ज्यों ज्यों विषयभोग में डूबते जाते त्यों त्यों उनकी प्यास बढ़ती ही जाती थी। एक दिन उनको अपनी अवस्था पर बड़ी ग्लानि हुई और स्वयं पर बड़ा पछतावा हुआ। वह सोचने लगे कि कामनाओं की यह कैसी प्यास है, यह कैसी तृष्णा है, जो कभी बुझती ही नही। उनके मन ने उन्हें धिक्कारा की “अरे मूर्ख! अपनी सुखों की प्यास बुझाने के लिए तूने अपने पुत्र के साथ कितना बड़ा अनर्थ कर दिया। उसे अपना बुढ़ापा देकर तूने तो उसके सुख चैन ही छीन लिए, उसे तो अपना जीवन जीने का अवसर ही नही मिला”। यह भान होते ही राजा ने स्वयं को धिक्कारा की माया के वशीभूत होकर मैंने अपने पुत्र के साथ बड़ा अधर्म कर दिया, लेकिन अब एक क्षण भी व्यर्थ नही जाने दूँगा। वे तुरन्त अपने पुत्र “पुरु” के पास गए, उसे उसकी जवानी वापस दी, उसका बुढ़ापा स्वयं ले लिया, अपने पुत्र को अनेक आशीर्वाद देकर और स्वयं सन्यास धारण कर वन को प्रस्थान कर गए।

इसी वंश में आगे चलकर जगत पालनकर्ता श्रीहरि विष्णु ने “श्रीकृष्ण” रूप में अवतार लिया। कौरव, पांडव भी इसी कुल में जन्मे थे।

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