महान ऋषि दधीचि जिन्होंने धर्म को बचाने के लिए दिये अपने प्राण

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भारत एक आध्यात्मिक देश है. सनातन हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है. हमारा यह देश वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का एक महान देश है. और यह महानता हमे प्राप्त हुई है हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों के परिश्रम से, उनके तप से, उनके त्याग से. हमारे ऋषियों ने अपना समस्त जीवन मानव कल्याण के हित के लिए अनेक अनुसंधान करने में बिता दिया. स्वयं के लिए कुछ प्राप्ति की आशा के बिना ही ऋषियों ने मानव समाज के उत्थान और परोपकार के लिए अपना सर्वस्व भी त्याग दिया.

संसार में समस्त प्राणी अपने लिए जीते है. सभी अपना भला चाहते है लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते है जो परोपकार हेतु अपने हितो का बलिदान कर देते है. हमारे देश में ऐसे अनेक उदाहरण है जिन्होंने दूसरो की सहायता और भलाई के लिए स्वयं कष्ट सहे है. आज हम आपका परिचय एक ऐसे ही महान व्यक्तित्व से करवाने जा रहे है जिन्होंने संसार के कल्याण के लिए अपने प्राण भी त्याग दिए. उनका नाम था “महर्षि दधीचि”.

प्राचीन काल में एक परम तपस्वी ऋषि थे, जिनका नाम महर्षि दधीचि था. उनके पिता एक महान ऋषि अथर्वा जी थे और माता का नाम शांति था. माता पिता से उन्हें बचपन से ही ऋषियों वाले संस्कार प्राप्त हुए. मानव कल्याण और परोपकार की भावना उनके अंतःकरण में बालपन से ही विद्यमान थी. महिर्षि दधीचि बालब्रह्मचारी तथा जितेन्द्रिय थे. लोभ, भय उन्हें छू तक नहीं गया था. वे त्याग के साथ-साथ अन्याय का प्रतिकार करना भी जानते थे. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था. कालांतर में वे एक ख्यातिप्राप्त महर्षि हुए. वे सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे. वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे. नैमिषारण्य के एक वन में उनका आश्रम था, वही वे अपने शिष्यों को धर्म का उपदेश दिया करते थे. उनके तप के प्रभाव से उनके आश्रम के परिसर में प्रवेश करते ही हिंसक पशु भी हिंसा भूल कर दयाभाव से ओतप्रोत हो जाते थे.

वे इतने परोपकारी थे कि पृथ्वी को असुरों के संताप से मुक्त करने के लिए उन्होंने अपनी अस्थियां तक दान कर दी थी. आइए पढ़ें परोपकारी महर्षि दधीचि की लोक कल्याण के लिए किए गए परोपकार की कथा:

एक बार की बात है. वृतासुर नामक दैत्य अपनी समस्त असुर सेना लेकर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के उद्देश्य से देवताओं पर चढ़ाई कर दी. अगर स्वर्ग पर असुरों का अधिपत्य हो जाता तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता. देवताओं और असुरों में भयंकर संग्राम छिड़ गया. महीनों तक युद्ध चलते रहा लेकिन देवसेना असुरों को परास्त नही कर पाई. तब देवराज इंद्र ने परमपिता ब्रह्मा के पास जाकर अपनी समस्या सुनाई और सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए उनसे सहायता की प्रार्थना की. तब परमपिता ब्रह्मदेव ने देवराज इंद्र को कहा कि, वृतासुर का अंत केवल महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने अस्त्र से ही हो सकती है, अन्य कोई मार्ग नही. देवराज इंद्र तो धर्मसंकट में फँस गए. किसी जीवित मनुष्य वो भी एक ऋषि से, उनकी हड्डियां कैसे मांगे. पशोपेश में उलझे देवराज महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे. उस वक्त महर्षि दधीचि साधना में लीन थे. देवराज निकट ही हाथ जोड़े खड़े रहे. जब महर्षि दधीचि अपनी साधना से बाहर आए तब देवराज को अपने सामने उपस्थित पाया.

अपनी समस्या लेकर महर्षि दधीचि के सम्मुख उपस्थित देवगण

वे देवराज इंद्र को आदरपूर्वक अपने आश्रम ले आए, एवं उनके आने का प्रयोजन पूछा. संकोचवश देवराज इंद्र महर्षि से कुछ कह नही पाए तब महर्षि दधीचि ने स्वयं ही अपने योगबल से देवराज इंद्र की मनोइच्छा जान ली. वे मुस्कुराते हुए देवराज से कहने लगे कि, हे देवेंद्र! मैं आपका मनोभाव अच्छी तरह जान गया हूँ. सृष्टि का संतुलन बने रहने में ही मनुष्य जाति का कल्याण है और सृष्टि के संतुलन के लिए ये परम् आवश्यक है कि स्वर्ग पर देवताओं का ही अधिपत्य रहे इसीलिए आप जो मनोकामना लेकर मेरे पास आए है मैं उसे अवश्य पूरी करूँगा. लोकहित के लिए मैं आपको अपना शरीर दान देता हूँ, मैं आपको अपनी अस्थियों का दान करता हूं, आप मेरी अस्थियों से “वज्र” नामक अस्त्र का निर्माण कीजिए एवं वज्र के प्रहार से वृतासुर का अंत कर मनुष्य एवं अन्य प्राणियों को असुरों के कष्ट से मुक्त करो. देवराज आश्चर्य से महर्षि की ओर देखे जा रहे थे और इतने में ही महर्षि दधीचि ने अपने तप एवं योगबल द्वारा अपने स्थूल शरीर का विसर्जन कर दिया. अब उस स्थान पर केवल उनकी अस्थियां ही शेष रह गई थी. इंद्र ने उन पवित्र अस्थियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया और ब्रह्मा जी के कहे अनुसार उन अस्थियों से “वज्र” नामक अस्त्र का निर्माण किया और वृतासुर का अंत किया, असुर पराजित हुए और देवताओं की विजय हुई. लंबे समय तक चलने वाले एक महायुद्ध का अंत हुआ और तीनों लोकों में शांति स्थापित हुई.

अपने वज्र के साथ देवराज इंद्र

महर्षि दधीचि को उनके त्याग के लिए आज भी लोग श्रद्धा से याद करते है. नैमिषारण्य में प्रतिवर्ष फागुन माह में उनकी स्मृति में मेले का आयोजन होता है. यह मेला महर्षि के त्याग और मानव सेवा के भावो की याद दिलाता है.

हमें आशा है कि आपको ये प्रसंग पसन्द आया होगा एवं मानव कल्याण के लिए महर्षि दधीचि के त्याग ने आपको भी अवश्य ही प्रेरित किया होगा. हमारा प्रयास है कि हम ऐसे ही पौराणिक प्रसंगों द्वारा आपको प्रेरित करते रहें.

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