सनकादिक ऋषियों का जय-विजय को श्राप

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सृष्टि के आदि में जब ब्रह्मा जी सृष्टि निर्माण कर रहे थे, तब सबसे पहले उन्होंने अपने संकल्प शक्ति से चार पुत्रो को उत्पन्न किया जिनके नाम थे- सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। ये चारों “सनकादि ऋषि” कहलाते है, और हमेशा छोटे से बालक के रूप में रहते है। जन्म से ही चारो भाई सांसारिक मोह माया से दूर भगवान विष्णु की आराधना किया करते थे। अपने तप और ज्ञान के बल पर ये सभी लोकों में निर्विघ्न विचरण किया करते थे, कोई भी इन्हें रोक-टोक नही कर सकता था।

एक बार सनकादिक ऋषियों को विष्णु दर्शन की इच्छा हुई। सो वे चारो बैकुंठ लोक पहुँच गए, लेकिन जब द्वार से भीतर घुसने लगे तो भगवान विष्णु के द्वारपाल “जय और विजय” ने उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया। जय और विजय ने सनकादिक ऋषियों से कहा कि अभी भगवान विष्णु आराम कर रहे है, इसीलिए अभी आपको प्रवेश नही मिल सकता। सनकादिक ऋषियों ने जय-विजय को समझाया कि वे अपनी इच्छा से कहीँ भी आ जा सकते है, कोई उन्हें नही रोकता। और फिर हम तो जगदीश्वर के दर्शनार्थ आए है, तुम दोनों हमे भला क्यों रोक रहे हो, दर्शन करके कुछ देर में वापस चले जाएंगे, इसमें तुम दोनों को क्या परेशानी है। लेकिन जय-विजय ने उन्हें प्रवेश नही दिया। सनकादिक ऋषियों ने दोनो को लाख समझा लिया लेकिन जय और विजय नही माने। इतने देर से समझाने के बाद भी जब जय विजय अपनी बात पर अड़े रहे तब सनकादिक ऋषियों को तनिक क्रोध आ गया। आवेश में आकर सनकादिक ऋषियों ने जय-विजय से कहा- “मूर्खों! तुम दोनों भगवान विष्णु के द्वारपाल हो, तुम्हे उन्ही के जैसे परम् शान्तिमय स्वभाव का होना चाहिए, लेकिन तुम दोनों तो मनुष्यों के जैसे अहंकार से भरे हो, जाओ हम तुम्हे श्राप देते है कि तुम मृत्युलोक में जाकर जन्म लो”।

सनकादिक ऋषियों द्वारा जय-विजय को श्राप देते ही भगवान विष्णु माता लक्ष्मी सहित द्वार पर आ गए और जय-विजय द्वारा की गई धृष्टता की क्षमा याचना करने लगे। भगवान विष्णु ने सनकादिक ऋषियों से कहा- “हे मुनिश्वरों! ये दोनों द्वारपाल जय और विजय मेरे ही पार्षद है। इन्होंने अंहकार में आकर आपका जो अपमान किया है, उसके लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। आप चारों मेरे परम प्रिय भक्त है, और मेरे भक्तों की अवज्ञा अपरोक्ष रूप से मेरी ही अवज्ञा है। ब्राह्मण मुझे अति प्रिय है, इन्होंने ब्राह्मणों का अपमान कर भूलवश मेरा ही अपमान किया है। आपने इन्हें श्राप देकर उचित ही किया है। सेवकों की गलती भी स्वामी की गलती ही मानी जाती है, अतः मैं आप चारो से विनती करता हूं कि आप क्रोध त्याग कर प्रसन्न हो जाइए।

भगवान के मधुर वचन सुनकर सनकादिक ऋषियों का क्रोध शांत हो गया और वे श्रीहरि से कहने लगे- “आप स्वयं धर्म है और धर्म की मर्यादा रखने के लिए ही अपने भक्तों से प्रेम भी करते है। गलती तो हमसे भी हुई है, क्रोध जीव का शत्रु है और हमने बैकुंठ लोक में आकर भी क्रोधवश इन निरपराध पार्षदों को श्राप दे दिया। हमसे बड़ी भूल हुई प्रभु! हमे क्षमा करें, और आप तो सर्वशक्तिमान है, आप चाहे तो हमारे मुख से निकले हुए श्राप को मिथ्या कर सकते है। आप जय-विजय के श्राप का निरावरण कर दीजिए”। भगवान विष्णु ने कहा- ” मुनिवरों! श्राप का निराकरण तो मैं कर सकता हूँ लेकिन इससे धर्म की मर्यादा भंग होगी। ब्राह्मणों के मुख से निकला हुआ वचन यदि मिथ्या हो गया तो भविष्य में ब्राह्मणों की बात सुनेगा कौन? इसीलिए आपका श्राप तो फलीभूत होगा ही। आप चाहे तो स्वयं इसमें संशोधन कर सकते है”। तब सनकादिक ऋषियों ने अपने श्राप में संशोधन कर जय और विजय दोनो को तीन जन्म तक मृत्युलोक में जन्म लेना होगा तब इनकी श्राप मुक्ति हो जाएगी और ये पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हो जाएंगे”। भगवान विष्णु ने कहा कि ये सब मेरी ही लीला का एक अंग है और जो भी हुआ है मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। जय और विजय का उद्धार करने मैं स्वयं धरतीलोक में अवतार लूँगा।

पहले जन्म में जय और विजय, हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष हुए। भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का और नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का उद्धार किया। यही जय और विजय त्रेतायुग में रावण और कुम्भकर्ण हुए, जिसके उद्धार के लिए भगवान ने श्रीराम अवतार लिया। अंतिम और तीसरे जन्म में जय और विजय ने शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप में जन्म लिया और भगवान उनके उद्धार के लिए श्रीकृष्ण रूप में अवतरित हुए, भगवान द्वारा उनका अंत हुआ और जय विजय दोनो ही श्रापमुक्त होकर पुनः बैकुंठ लोक पहुंचे और भगवान के पार्षद हुए।

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