गणेश चतुर्थी विशेष : क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पूरे भारतवर्ष में श्रीगणेश जन्मोत्सव मनाया जाता है। श्री गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। वैसे तो यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागों में अपनी अपनी रीति रिवाजों और मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में यह बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। चतुर्थी के दिन श्रीगणेश जी की मूर्ति स्थापना की जाती है और दस दिनों तक धूमधाम से पूजन-अर्चन-उत्सव मनाए जाने के बाद चतुर्दर्शी के दिन प्रतिमा विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होता है। घर घर मे तो यह उत्सव होता ही है साथ ही सार्वजनिक पंडालों में भी जनसहयोग से गणेश स्थापना की जाती है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। नौ दिन तक पूजन अर्चन के बाद दसवें दिन गाजे बाजे के साथ गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि के जल में विसर्जित किया जाता है। वैसे तो यह प्रथा आदिकाल से ही चली आ रही है किन्तु भारत पर मुगलों के अतिक्रमण के वक्त सार्वजनिक पूजा पद्धतियों पर रोक लग गई थी। बाद में अंग्रेजी शाषन के वक्त क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक जी ने आम जनमानस को अंग्रेजी शाषन के विरुद्ध एकजुट करने के उद्देश्य से सार्वजनिक गणेश उत्सव मनाने की परम्परा को पुनर्जीवित किया था।

पुराणों के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ही गणेश जी का जन्म हुआ था। आइए पढ़ते है उनके जन्म से जुड़ी हुई कथा :

शिवपुराण के अंतर्गत रुद्रसंहिता के चतुर्थ खण्ड में इस कथा का वर्णन मिलता है। एक बार माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने शरीर के मैल से एक बालक को उत्पन्न किया और उसे बाहर द्वार पर पहरा देने का निर्देश देते हुए कहा – “पुत्र, जब तक मैं स्नान न कर लूं तुम द्वार पर पहरा देते रहो और किसी को भी अंदर प्रवेश मत करने देना।” बालक माता को प्रणाम कर आज्ञानुसार द्वार पर पहरा देने लगा। इतने में वहाँ भगवान शंकर आ गए और अंदर जाने लगे। शंकर जी को पता नही था कि यह बालक पार्वती से उत्पन्न हुआ है।

बालक भी भगवान शिव के बारे में कुछ नही जानता था, उसे तो बस अपनी माता के आदेश का पालन करना था सो उसने भगवान शिव को अंदर जाने से रोक दिया। भगवान शंकर इस बात से नाराज हो गए, उन्होंने बालक को बहुत समझाया लेकिन बालक अपनी बात पर अड़ा रहा और उन्हें अंदर प्रवेश नही करने दिया। भगवान शिव के गण यह सब देखकर अत्यंत क्रुद्ध हो गए और उन्होंने बाल गणेश पर आक्रमण कर दिया। गणेशजी ने सभी शिव गणों को मार पीट कर भगा दिया। अपने गणों की इस तरह हुई दुर्दशा देखकर भगवान शंकर को भी क्रोध आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश का सर काट दिया। इतने में वहाँ माता पार्वती आ गई और शंकर जी को सारी बात बताकर की ये हमारा ही पुत्र था, अपने पुत्र की मृत्यु पर विलाप करने लगी। तब भगवान शंकर ने एक हाथी के बालक का सर लगाकर पुत्र गणेश को जीवित किया।

इस दिन चन्द्रदर्शन का निषेध रहता है। प्रत्येक चतुर्थी का व्रत चन्द्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है लेकिन केवल इसी चतुर्थी को चन्द्रमा का दर्शन नही किया जाता अन्यथा मिथ्या चोरी का कलंक लगता है। इसके पीछे भी एक कथा है।

एक बार श्रीगणेश के विचित्र आकर को देखकर चन्द्रमा ने उनका उपहास किया था। गणेशजी ने क्रोधित होकर चन्द्रमा को श्राप दे दिया था कि आज से जो भी तुम्हे देखेगा उसे कलंक लगेगा। चन्द्रमा ने सोमनाथ में आकर भगवान शंकर की तपस्या की, भगवान शंकर प्रसन्न हुए, गणेश जी से आग्रह किया कि सृष्टि के संचालन में चंद्रमा की महत्वपूर्ण भूमिका है, इसीलिए अपने श्राप में कुछ संशोधन कर दीजिए। गणेशजी ने अपने श्राप को घटाकर एक दिन के लिए कर दिया और कहा कि- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन जो भी कोई चन्द्रमा के दर्शन करेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा। गणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले को यह श्राप नही लगता। एक बार भगवान श्री कृष्ण ने भी भूलवश इस दिन चन्द्रमा का दर्शन कर लिया था तो उनपर सम्यन्तक मणि की चोरी का मिथ्या कलंक लगा था।

अगर आपने भूलवश इस दिन कभी चन्द्रमा का दर्शन कर भी लिया है तो भगवान श्रीकृष्ण और सम्यन्तक मणि की कथा पढ़ने से दोष हट जाता है।

सम्यन्तक मणि की कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें-
“कथा सम्यन्तक मणि की, जब भगवान श्रीकृष्ण पर लगा कलंक”

हिन्दुबुक के हमारे सभी पाठकों को श्रीगणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं।

।। जय श्री गणेश ।।

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