गजेन्द्रमोक्ष, कथा “गज और ग्राह” की, कैसे भगवान विष्णु ने अपने भक्तों का किया उद्धार

शेयर करना न भूलें :

जगतपालक “श्रीहरि विष्णु” प्रत्येक काल युग और मन्वंतर में अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए इस धराधाम पर अवतार लेते रहे है। ऐसे ही एक मन्वन्तर में उन्होंने अपने परम भक्त ‘गजेन्द्र’ का उद्धार किया था। आज हम हिन्दुबुक के पन्नो से आपके लिए लेकर आए है, कथा “गजेन्द्रमोक्ष” की, कथा “गज और ग्राह” की। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार त्रिकुट पर्वत के जंगलों में एक “गजेन्द्र” नाम का मतवाला हाथी रहता था। अति बलशाली वह गजेन्द्र उस वन के सभी हाथियों का राजा था, अनेक हथिनियों संग क्रीड़ा करता हुआ वह उस वन में मदमस्त घूमा करता था।

एक बार हथिनियों संग वनक्रीड़ा करते हुए गजेन्द्र एक सरोवर के निकट आ पहुंचा। गर्मियों के दिन थे, वन में घूमते घूमते काफी देर भी हो गई थी, प्यास के कारण उसका गला सूख रहा था। सरोवर को देखा तो अपनी तृष्णा मिटाने के लिए उसी सरोवर से पानी पीने लगा। प्यास मिटाने के बाद वह उसी सरोवर में घुसकर स्नान भी करने लगा। स्नान कर लेने के उपरांत अपने सूंड में पानी भरकर वह किनारे बैठी हथिनियों पर फेंकने लगा। काफी देर तक जलक्रीड़ा करते रहने से, इधर उधर पानी फेंके जाने से उस सरोवर में कीचड़ बनने लगा और सरोवर गन्दा होने लगा, इस वजह से उसमे रहने वाला एक “ग्राह” (मगरमच्छ) नाराज हो गया। उसने दौड़ कर गजेन्द्र का पांव पकड़ लिया और उसे सरोवर के भीतर खींचने लगा।

अपने बल के अहंकार में गजेन्द्र ने मगरमच्छ को हल्के में ले लिया, और कहने लगा कि ये नन्हा सा जीव मुझे सरोवर में खींचना चाहता है, किन्तु जब पैर छुड़ाने लगा तो उसे मगरमच्छ की ताकत का अंदाजा हो गया। गजेन्द्र अपना पैर छुड़ाने की जितनी कोशिश करता, मगरमच्छ उतनी ही ताकत से उसे पानी के और अंदर तक खींच लेता। कई दिन बीत गए, लेकिन मगरमच्छ ने गजेन्द्र का पैर नही छोड़ा। गजेन्द्र भी अपनी सारी कोशिशें कर के हार गया, लेकिन स्वयं को उस ग्राह से मुक्त नही कर पाया। थक हार कर किनारे बैठी हथिनियों की ओर दया दृष्टि से देखने लगा कि आओ और मुझे जल से बाहर निकालो। हथिनियों ने जब अपने स्वामी की यह हालत देखी तो सूंड से सूंड जोड़ कर गजेन्द्र को बाहर किनारे तक खींच ले आई, लेकिन मगरमच्छ भी इतना बलशाली था की गजेन्द्र को फिर से खींच कर पानी के भीतर ले आया। अब तो हथिनियों ने भी तमाम कोशिशें कर ली लेकिन गजेन्द्र को मगरमच्छ से मुक्त नही करा पाई। गज और ग्राह के बीच का यह द्वंद पानी मे हो रहा था और पानी का राजा मगरमच्छ होता है, पानी मे उसका बल भी अधिक रहता है। धीरे धीरे मगरमच्छ की ताकत बढ़ती गई और हाथी का बल घटता गया। महीनों तक यह लड़ाई चलती रही, तमाम प्रयास कर लेने के बाद हथिनियों ने यह जान लिया कि अब गजेन्द्र को बचा पाना सम्भव नही है, और वो सारी हथिनियां जो कल तक मदमस्त गजेन्द्र के आगे पीछे घूमती रहती थी, संकटकाल आने पर वो सब उसे वही पानी मे मरता छोड़कर वापस वन की ओर चली गई। गजेन्द्र ने जब यह देखा कि ये सारी हथिनिया मुझे अकेला छोड़कर वापस जा रही है तो उसे स्वयं पर बड़ा पछतावा हुआ। उसने अपने आप से कहा कि- “देखो, जिनके लिए मैं सारी उम्र जिया, इतने बड़े परिवार को लेकर बड़े अभिमान से जंगल पर राज किया, सारी ज़िन्दगी इस परिवार के लिए जिया, दो घड़ी भी भगवान का नाम नही लिया, और संकटकाल आने पर यही परिवार मुझे अकेला मरने के लिए छोड़कर चला गया”।

यह हाथी पूर्वजन्म का एक राजा था, जिसका नाम “इन्द्रद्युम्न” था। राजा श्रीहरि विष्णु का परम भक्त था, राज्यकार्य में कम ध्यान दिया करता था, और अपना सारा समय विष्णुभक्ति में ही बिताया करता था। समय आने पर अपने पुत्र को राज्य देने के बाद राजा ने वन की राह पकड़ी, और भगवान विष्णु की तपस्या करने लगा। एक बार उस स्थान पर अगस्त मुनि का आगमन हुआ, राजा अपने ध्यान में मग्न था, अगस्त मुनि का आवभगत नही कर पाया। अगस्त मुनि ने इसे अपना अपमान समझा और राजा को श्राप दे दिया कि- “अपने अभिमान के सामने तू किसी को कुछ नही समझता, इतना अभिमान तो एक हाथी का होता है, जा तू हाथी ही बन जा”। राजा ने अपनी नियति मानकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। यही राजा अगले जन्म में “गजेन्द्र” हुआ जो इस वक्त मगरमच्छ रूपी मृत्यु के मुख में फँसा हुआ था।

अपने पूर्वजन्म की याद आते ही गजेन्द्र ने भगवान विष्णु की आराधना शुरू कर दी। श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध के तृतीय अध्याय में गजराज गजेन्द्र द्वारा भगवान विष्णु की की गई स्तुति “गजेन्द्रमोक्ष” के नाम से वर्णित है। इस पूरे एक अध्याय में गजेन्द्र ने भगवान विष्णु की स्तुति कर उन्हें आर्तभाव से पुकारा है। अपने भक्त की पुकार सुन भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर सवार होकर उस सरोवर के निकट पहुँचे। गजेन्द्र ने जब गरुड़ पर आरूढ़, शंख, चक्र, पदम्, गदाधारी चतुर्भुज रूप में भगवान विष्णु को देखा तो सरोवर में लगे कमल के एक पुष्प को अपनी सूंड से तोड़कर भगवान के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया, भक्तवत्सल भगवान विष्णु ने भी अपना हाथ बढ़ाकर गजेन्द्र को सरोवर से बाहर खींच लिया, गजेन्द्र के साथ मगरमच्छ भी सरोवर से बाहर निकल आया लेकिन उसने अभी भी गजेन्द्र का पैर अपने मुँह में पकड़ रखा था। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ के जबड़े को चीर दिया और गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त कर दिया।

वह मगरमच्छ भी एक श्रापित गन्धर्व था जिसका नाम “हूहू” था, जो देवताओं की सभा मे एक विदूषक का काम करता था। एक दिन देवल नामके एक ऋषि एक सरोवर में स्नान के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहे थे, तभी इस गन्धर्व ने हास-परिहास के उद्देश्य से पानी के अंदर देवल मुनि का पैर पकड़ लिया, और उन्हें डराने लगा। देवल मुनि ने जब देखा तो क्रोध में भरकर उसे श्राप दे दिया कि – “मूर्ख! गन्धर्व होकर ग्राह (मगरमच्छ) जैसी हरकत कर रहा है, जा तू मगरमच्छ बन जा”। गन्धर्व ने मुनि से क्षमा मांगते हुए कहा- “हे मुनिराज! मुझे क्षमा कर दीजिए, मैं तो आपसे केवल मजाक कर रहा था। मैं एक गन्धर्व हूँ, और हमारा तो कार्य ही देवताओं का मनोरंजन करना है”। देवल ऋषि को दया आ गई, गन्धर्व से कहा- “मेरा श्राप तो व्यर्थ नही जाएगा, लेकिन मैं तुझे भगवत्प्राप्ति का आशीर्वाद भी देता हूँ। इसी तरह पैर पकड़ते रहना, एक दिन भगवान विष्णु स्वयं तुम्हे “ग्राह” योनि से मुक्त करेंगे”।

भगवान विष्णु ने जब अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का जबड़ा चीर कर उसका अंत किया तब वह गन्धर्व मगरमच्छ का शरीर त्याग कर पुनः अपने दिव्य रूप में प्रकट हुआ, भगवान विष्णु को प्रणाम कर अपने गन्धर्व लोक को चला गया। गजेन्द्र भी अपने पूर्वजन्म के रूप को प्राप्त हुए और उनकी पूर्वजन्म की नारायण भक्ति के फलस्वरूप भगवान विष्णु ने उन्हें अपना पार्षद बना लिया और उन्हें अपने साथ लेकर बैकुंठ लोक चले गए।

कोई भी मनुष्य अगर किसी घोर संकट में फँसा हो, कर्ज में डूबा हो, कोई अन्य परेशानी हो, तो अगर वह अपने संकट मुक्ति के लिए ‘स-संकल्प’ नित्यप्रति “गजेन्द्रमोक्ष” का पाठ करना शुरू करे तो जल्द ही उसे उस संकट से मुक्ति मिल जाती है।

शेयर करना न भूलें :

1 comment

Leave a Reply

You cannot copy content of this page