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दुर्योधन की मृत्यु का मार्ग ये था कि जब वो खुशी और गम दोनो खबरें एक साथ सुनेगा तभी उसकी मृत्यु हो सकती है। महाभारत युद्ध मे जब भीम और दुर्योधन के बीच अंतिम युद्ध हो रहा था, कृष्ण का इशारा पाकर बाहुबली भीम ने दुर्योधन की जंघा पर गदा प्रहार किया तो दुर्योधन बिलबिला उठा किंतु उस वक्त उसकी मृत्यु नही हुई थी। कुरूक्षेत्र के किसी वन में पड़ा दुर्योधन अपनी मृत्यु का आव्हान कर रहा था कि तभी अश्वत्थामा वहाँ आ पहुंचा। उसने कहा , बताओ मित्र मै तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ? दुर्योधन ने कहा, युद्ध तो मै हार चुका, मेरी मृत्यु भी निश्चित है किंतु एक बात मुझे हमेशा तकलीफ़ देती रहेगी कि इस महायुद्ध में हम 100 के 100 भाई मृत्यु को प्राप्त हो गए किंतु पांडव पांचों के पांचों जीवित है। एकाध भी मारा जाता तो कलेजे को कुछ संतोष रहता। अश्वत्थामा ने कहा, चिंता न करो मित्र, तुम्हारी ये इच्छा मै पूरी करूँगा।

रात्रि में अश्वत्थामा ने पांडवो के शिविर में धोखे से हमला कर दिया और अनजाने में पांच पांडवो की जगह पांडव पुत्रो के सर काट डाले, जो कि दिखने में पांचों पांडवो जैसे ही दिखते थे, डील डौल भी अपने अपने पिता जैसा ही था। पांडव पुत्रो के कटे सरो को लेकर शीघ्रातिशीघ्र वो दुर्योधन के पास पहुंचा और बोला कि , लो मित्र तुम एक पांडव की मृत्यु की इच्छा रखते थे, मैने पांचों को मृत्युलोक रवाना कर दिया।

ये सुनकर दुर्योधन को असीम सुख की प्राप्ति हुई, प्रसन्नता में भरकर वह अश्वत्थामा से बोला- लाओ मित्र उनके कटे हुए सर मेरे सम्मुख रखो ताकि मरने से पहले मैं भी अपनी छाती ठंडी कर सकूं। जब अश्वत्थामा ने पाण्डव पुत्रो के कटे मस्तक दुर्योधन के सम्मुख रखे तो दुर्योधन के होश उड़ गए। झटका सा लगा उसे। जी भर कर अश्वत्थामा को गरियाने लगा। अरे मूर्ख! ये पांडव नही उनके पुत्र है। इनको मारकर तो तूने हमारा वंश ही समाप्त कर दिया, हमे और हमारे पुरखो को पानी देने वाला भी नही छोड़ा. जा , चला जा यहाँ से, दूर हो जा मेरी नज़रों से। और इतना कहते ही दहाड़े मारकर दुर्योधन अपनी मृत्यु को प्राप्त हुआ।

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