श्रीकृष्ण बाल लीला : धेनुकासुर वध

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श्रीकृष्ण और बलराम जब प्रौगड़ अवस्था में प्रवेश कर चुके थे अर्थात जब वे ६ वर्ष के हो चुके थे तो उन्हें गौएँ चराने की अनुमति मिल चुकी थी। वे अपने सखा ग्वालबालों के साथ नित्यप्रति वृंदावन के भिन्न भिन्न वनों में गौओं को चराने ले जाते और संध्या को वापस आ जाते। पर्वतराज गोवर्धन की तलहटियों में बसे अनेकों वन हरी हरी घास और सुंदर महकते पुष्पों से आच्छादित थे। आगे आगे गऊ, पीछे पीछे मुरली बजाते हुए श्रीकृष्ण और उनके पीछे बलराम और अन्य ग्वालबालों की मण्डली, इस तरह नित्यप्रति ही श्रीकृष्ण अपने चरणों से उन वनों को पवित्र करते हुए अपनी लीलाएँ करते रहते थे।

उन्ही वनों में ताड़ के लम्बे लम्बे वृक्षो से आच्छादित “तालवन” नामका एक प्रसिद्ध वन था। वह वृक्ष रसीले फलों से लकदक रहते थे लेकिन उस वन में “धेनुकासुर” नामक दैत्य रहता था जिसने वहाँ के मनुष्यों को उस वन में आने जाने पर प्रतिबंध लगा रहा था। धेनुकासुर उस वन में एक विशाल गधे के रूप में घूमा करता था, उसके साथ उसके अनुचर भी गधा बनकर उसके साथ घूमते थे।

एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम अपने सखा ग्वालबालों के साथ तालवन के आस पास ही गौएँ चराते हुए विचरण कर रहे थे की उनके ग्वाल सखाओ में से “श्रीदामा” नाम के एक ग्वाले ने बलराम जी से कहा – “हे राम और श्याम, आप दोनों के बल की तो कोई थाह ही नही है। कृष्ण के तो कई चमत्कार हमने देख लिए, लेकिन आपने अभी तक अपने बल का कोई चमत्कार हमे नही दिखाया। आपकी इन लम्बी और बलशाली भुजाओं के कारण आपको “महाबाहो” भी कहा जाता है, तो कभी इन भुजाओं का बल भी तो दिखाओ।”

बलराम जी ने कहा- “साफ साफ बोलो कहना क्या चाहते हो?”
श्रीदामा ने कहा- “दाऊ भैया, वो देखिए सामने तालवन है। उसमे ताड़ के कितने मधुर फल लगे हुए है, पके हुए फलों की महक यहाँ तक आ रही है। हमें बहुत दिनों से इन फलों को चखने की इच्छा है लेकिन धेनुकासुर के डर के मारे उस वन ने जाने की हिम्मत नही पड़ती। हम सबको उन फलों की बड़ी उत्कृष्ट अभिलाषा है। आज अपनी लम्बी भुजाओं का चमत्कार दिखाकर हमारी ये इच्छा पूरी कीजिए दाऊ भैया!”

ग्वालबालों की बात सुनकर कृष्ण बलराम मुस्कुरा दिए और अपनी ग्वाल मण्डली के साथ तालवन में प्रवेश कर गए। बलराम जी ने अपनी लम्बी लम्बी भुजाओं से ताड़ के वृक्षों को बड़ी जोर से हिलाना शुरू कर दिया, इससे उन वृक्षों के फल टूटकर नीचे गिरने लगे। फलों के गिरने की आवाज सुनकर गधा बना हुआ धेनुकासुर बड़े वेग से पर्वतों को कंपाने की ध्वनि करता हुआ उस स्थान पर आ गया और अपना सम्पूर्ण बल लगाकर अपने पिछले पैरों की एक दुलत्ती बलराम जी के छाती पर मारकर रेंकता हुआ वहाँ से हट गया।

वह गधा पुनः बड़ी वेग से बलराम जी की ओर दौड़ा और उनकी ओर पीठ करके अपने पिछले पैरों को हवा में लहराकर फिर से एक दुलत्ती का प्रहार बलराम जी पर करना चाहा, किन्तु इस बार महाबाहो बलरामजी ने अपनी विशाल भुजाएं फैला कर एक ही हाथ से उस गधे के दोनों पैर पकड़ लिए और बड़ी जोरों से उसे आकाश में घुमाकर एक बड़े से ताड़ के वृक्ष पर दे मारा। तत्काल धेनुकासुर के प्राण पखेरू उड़ गए। उस गधे का आकार इतना विशाल था की उसकी चोट से वह ताड़ का वृक्ष उखड़ कर भूमि पर गिर गया। गधे के रेंकने और ताड़ के वृक्ष के गिरने की आवाज सुनकर उसके सभी अनुचर वहाँ आ पहुंचे और ग्वाल मण्डली पर हमला कर दिया। बलरामजी और श्रीकृष्ण ने सभी को मार कर फेंक दिया।

कृष्ण और बलराम स्वयं जगदीश्वर के अवतार है, वे सृष्टि के कण कण में उसी तरह व्याप्त है जैसे वस्त्रों में सूत। उस समय वह सम्पूर्ण वन ताड़ के फलों से उसी तरह पट गया था जैसे बादलों से आकाश ढँक गया हो। भगवान की यह लीला देखकर आकाश में स्थित देवताओं ने कृष्ण बलराम पर पुष्पवर्षा कर उनकी स्तुति गाई। जिस दिन धेनुकासुर मरा, उसी दिन से लोग और वन के अन्य पशु पक्षी निडर होकर स्वच्छंदता के साथ तालवन में विचरण करने लगे और मीठे मीठे ताल फलों का रसास्वादन करने लगे।

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