अन्य देवताओं की तरह ब्रह्माजी की पूजा क्यों नहीं की जाती है ?

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सनातन धर्म में ब्रह्मा जी सृजन के देव माने गए हैं। शास्त्रों में ३ प्रमुख देव बताये गये है जिसमें ब्रह्मा सृष्टि के सर्जक, विष्णु पालक और महेश विलय करने वाले देवता हैं। सनातन हिन्दू मान्यता में चार वेद माने गए है जो ब्रह्मा जी के चार मुखों से उत्पन्न हुए है। भगवान ब्रह्माजी त्रिदेवों में लोकपितामह होने के कारण सभी के कल्याण की कामना करते हैं क्योंकि समस्त संसार ही इनकी प्रजा हैं। देवी सावित्री और सरस्वतीजी के अधिष्ठाता होने के कारण ज्ञान, विद्या व समस्त मंगलमयी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इनकी आराधना बहुत फलदायी है। सृष्टि की रचना करने से वे “विधाता” भी कहलाते हैं। ब्रह्माजी का जन्म भगवान श्रीहरि विष्णु के नाभिकमल से हुआ था।

सृष्टि के आदि में भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उसी कमल पर ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने यह देखने के लिए कि यह कमल कहां से निकला है, उसके नाल-छिद्र में प्रवेश किया और सहस्त्रों वर्षों तक उस नाल का पता लगाते रहे। परन्तु जब कोई पता न लगा तब अपने कानों में उन्हें ‘तप’ शब्द सुनाई दिया और वे वर्षों तक तप करते रहे। उन्हें अंत:करण में भगवान श्रीहरि विष्णु के दर्शन हुए और भगवान विष्णु ने चार श्लोकों में उन्हें ‘चतु:श्लोकी भागवत’ का उपदेश देकर सृष्टि निर्माण का कार्य सौंपा। बाद में ब्रह्माजी ने यही उपदेश देवर्षि नारद को सुनाया था और नारदजी ने भगवान व्यासजी को यह दिव्य ज्ञान दिया। महर्षि व्यासजी ने ‘श्रीमद्भागवत’ के रूप में इसे लिपिबद्ध कर शुकदेवजी को इसका श्रवण करवाया और शुकदेवजी से फिर यह दिव्य ज्ञान संसार मे प्रचारित हुआ।

भगवान ब्रह्मा की पूजा-आराधना का एक विशिष्ट सम्प्रदाय है जो ‘वैखानस आगम’ के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्माजी की सब जगह अमूर्त उपासना होती है, अर्थात उनकी मूर्ति की पूजा नही होती है, किन्तु मन्दिरों के रूप में उनकी पूजा केवल पुष्करजी तथा ब्रह्मावर्त क्षेत्र (बिठूर) में ही होती है। कई लोगो के मन मे प्रश्न उठता है कि अन्य देवताओं की तरह ब्रह्माजी की पूजा क्यों नहीं की जाती है? इसीलिए आज हम हिन्दुबुक के पन्नो से अपने पाठकों के लिए लेकर आए है व्यापक स्तर पर ब्रह्माजी की मूर्तिपूजा न होने का कारण :

अन्य देवी देवताओं की तरह ब्रह्माजी की प्रतिमा की पूजा न होने का कारण हमें पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड मिलता है।

एक समय की बात है। राजस्थान स्थित पुष्कर तीर्थ क्षेत्र की पवित्र भूमि पर ब्रह्माजी के नेतृत्व में देवताओं ने एक महायज्ञ का आयोजन किया था। महायज्ञ में सभी देवता अपनी अपनी देवपत्नियों संग उपस्थित हो गये थे और सभी की पूजा आदि के पश्चात् हवन की तैयारी होने लगी, किन्तु ब्रह्माजी की पत्नी देवी सरस्वतीजी देवपत्नियों के द्वारा बार बार बुलाये जाने पर भी किसी कारणवश विलम्ब करती गईं। बिना पत्नी के यज्ञ में बैठने का विधान नहीं है और इसीलिए यज्ञ आरम्भ करने में बहुत बिलम्ब होता देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने कुछ समय के लिए सावित्री नाम की कन्या को यज्ञपूजा में ब्रह्माजी के वामभाग में बैठा दिया।

कुछ देर बाद जब देवी सरस्वतीजी वहां पहुंचीं तो वे अपनी जगह किसी और कन्या को बैठी देखकर क्रुद्ध हो गयीं और उन्होंने देवताओं को बिना किसी सोच विचार के किसी अन्य स्त्री को ब्रह्मापत्नी के स्थान पर बैठा दिए जाने के कारण संतानरहित होने का श्राप दे दिया और ब्रह्माजी को तीर्थराज पुष्करजी के अतिरिक्त अन्य किसी भी जगह मन्दिर में प्रतिमा रूप में पूजित न होने का श्राप दे दिया। यही कारण है कि पुष्कर जी के अतिरिक्त ब्रह्माजी की मूर्ति रूप में पूजा-आराधना अन्य जगह नहीं होती है। कालांतर में एक दो अन्य स्थानों पर भी ब्रह्मा जी की मूर्ति रूप में पूजा शुरू हुई है।

किन्तु इससे सनातन धर्म मे ब्रह्माजी का महत्व कम नहीं हो जाता। सृष्टि निर्माण का उनका कार्य तो है ही, भगवान विष्णु के अवतार लेने में भी ब्रह्माजी ही निमित्त बनते है। इसके अतिरिक्त शास्त्रों में जिन बारह परम भागवत पुरुषों की व्याख्या है उसमे ब्रह्माजी का अग्रणी स्थान है। चारो वेदों का जन्म भी ब्रह्मा जी द्वारा ही हुआ है, तथा उपवेदों के साथ इतिहास-पुराण के रूप में ‘पंचम वेद’ की रचना में भी ब्रह्मा जी की अहम भूमिका है। इनके अतिरिक्त यज्ञ के होता, उद्गाता, अर्ध्वयु और ब्रह्मा आदि ऋत्विज् भी ब्रह्माजी से ही प्रकट हुए हैं। यज्ञ के मुख्य निरीक्षक ऋत्विज् को ‘ब्रह्मा’ नाम से जाना जाता है जो प्राय: यज्ञकुण्ड के दक्षिण दिशा में स्थित होकर यज्ञ-रक्षा और निरीक्षण का कार्य करता है। यज्ञ-कार्य में सबसे अधिक प्रयोग होने वाली पवित्र समिधा पलाश-वृक्ष की मानी जाती है जो ब्रह्माजी का ही स्वरूप माना गया है। तमाम देवता, असुर और ऋषि मुनि भी वरदान प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी की ही आराधना में कठोर तप करते है।

ब्रह्माजी ने पुष्कर, प्रयाग और ब्रह्मावर्त क्षेत्र में विशाल यज्ञों का आयोजन किया था, इसलिए ब्रह्माजी के कमल के नाम पर पुष्कर और यज्ञ के नाम पर प्रयाग तीर्थ स्थापित हुए जिसे सभी तीर्थों के राजा, पुरोहित व गुरु माना गया है । काशी के मध्यभाग में ब्रह्माजी ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे जिस कारण इस स्थान को दशाश्वमेध-क्षेत्र कहते हैं।

।। जय श्री राम ।।

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