सीखिए भगवान विष्णु से : मुसीबत पड़ने पर शत्रुओं से भी काम कैसे निकलवाया जाता है

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दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवताओं का सौभाग्य उनसे रूठ गया था और इसी अवसर का लाभ उठा के दैत्यगुरु शुक्राचार्य के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी, भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को उनका सौभाग्य पुनः प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन करने को कहा। देवताओं ने कहा कि भगवन इतनी विशाल जलराशि का मंथन हम अकेले कैसे करेंगे। प्रभु ने कहा, अकेले तो नही कर पाओगे। इसके लिए तुम्हे असुरों की सहायता लेनी होगी। देवताओं ने कहा कि वे तो हमारे शत्रु है। वो भला हमारी सहायता क्यों करेंगे? और पहली बात तो ये की हम उनसे सहायता क्यों मांगे? भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, देवताओं, इसके अलावा तुम्हारे पास कोई और रास्ता नही है। एक बात का हमेशा ध्यान रखो, जब परिस्थितियां मुश्किल हो तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। तुम असुरों से उसी प्रकार मित्रता करो जब एक सर्प ने संकट में पड़ने पर एक चूहे से मित्रता की थी। देवताओं ने कहा, भगवन! सांप और चूहे की मित्रता कैसे हो सकती है भला। प्रभु ने कहा , मैं बताता हूँ…

एक सेठ था, उसने अपने लिए एक विशेष सूट सिलवा रखा था, और उसे रखने के लिए एक तौर पर लकड़ी की एक पिटारी बनवा रखी थी। एक बार सूट निकालने के बाद सेठजी पिटारी की कुंडी बन्द करना भूल गए, एक चूहा उस पिटारी में घुस गया, पीछे पीछे एक साँप भी उस पिटारी में घुस गया। सेठ को ध्यान आया कि आज पिटारी का दरवाजा बंद करना भूल गया है, उसने तुरंत दरवाजा बंद कर दिया। साँप ने चूहे को देखा तो जीभ लपलपाने लगा लेकिन फिर सोचा कि चूहे को खा लेने के बाद मैं भी तो इस पिटारी में बन्द पड़ा मर जाऊँगा। सर्प बुद्धिमान था, उसने दिमाग लगाया कि ये चूहा ही मुझे यहाँ से बाहर निकालेगा। उसने प्यार भरी दृष्टि से चूहे की तरफ देखा तो चूहा डर के मारे थर थर कांप रहा था। सांप ने चूहे से कहा- मामाजी प्रणाम! कुशल से तो हो? चूहे ने कहा कि भाई कौन मामा? कैसा मामा? सांप से कहा- अरे आपको नही पता? हाल ही में हम सर्पो की एक सभा हुई थी, उसमे निर्णय हुआ कि अब से चूहों को भोजन बनाना बन्द, अब से सर्प और मूषक साथ साथ रहेंगे। चूहे ने पूछा भैया इसमें तुम्हारा क्या स्वार्थ है? सांप ने कहा कि स्वार्थ कुछ नही है मामाजी, आप लोग अपने पैने पैने दांतो से हम लोग के लिए बिल खोदते हो, और हम आप लोगो को हो खा जाते थे। ये तो अत्याचार था, इसीलिए हम सर्पो ने सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया है कि अब से ये अत्याचार बन्द। चूहा ये सुनकर बड़ा खुश हो गया।

साँप ने कहा- मामाजी! आज तो बुरे फँस गए दोनो। अब क्या करेंगे। चूहा बोला- अरे भानजे! मुझे मामा बोला है तो अब इस मामा का कमाल भी देख। चूहें ने अपने दांतों से उस पिटारी को कुतरना शुरू कर दिया और जल्द ही बाहर निकलने लायक एक छेद बना दिया। सांप से कहा- भांजे, तू छोटा है तू निकल पहले, सांप पिटारी से बाहर आ गया और चूहे से कहा कि मामा जी आप भी बाहर आ जाओ। चूहा जैसे ही बाहर आया, सांप ने झपटकर उसे अपने मुंह मे दबा लिया। चूहे ने कहा- अरे भांजे, ये क्या कर रहे हो। सांप ने कहा- हम दोनों जब तक पिटारी में बंद थे तभी तक आप मामा थे, इतना कहकर सांप चूहे को पेट मे डालकर निकल लिया।

भगवान विष्णु ने कहा- देवताओं जिस तरह सांप ने संकट आने पर चूहे से रिश्तेदारी जोड़ ली उसी तरह तुम लोग भी असुरों से जाकर रिश्तेदारी जोड़ो, आखिर एक ही बाप के बेटे हो, और उनकी सहायता लेकर समुद्र का मंथन करो, उसमे से निकले अमृत का सेवन करने पर ही तुम्हारा रूठा हुआ सैभाग्य तुम्हे पुनः प्राप्त होगा और उसी के बाद स्वर्ग पर पुनः देवताओं का अधिकार होगा। देवता समझ गए कि क्या करना है, भगवान विष्णु को प्रणाम कर दैत्यों के पास जा पहुँचे, उनसे मित्रता की और उनकी सहायता लेकर समुद्रमन्थन किया। समुद्र से निकले अमृत को पीकर स्वर्ग पर पुनः देवताओं की सत्ता स्थापित हुई।

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