कथा एक ऋषि की जिसने भगवान विष्णु को मारी थी लात

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पौराणिक काल मे भारतवर्ष में एक महान ऋषि थे, जिनका नाम था “महर्षि भृगु”। उनकी महानता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा रचित सुप्रसिद्ध ज्योतिषीय ग्रंथ “भृगु संहिता” द्वारा मनुष्य के तीन जन्मों का फलादेश बताया जा सकता है। सूर्य, चन्द्र एवं अन्य ग्रहों की दशा की गणितीय गणना द्वारा केवल मनुष्यों का फलादेश ही नही अपितु कृषि-कार्य के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणी की जाती थी। किन्तु आज इस ग्रंथ के जानकर विद्वान बहुत कम बचे है जो इस ग्रन्थ द्वारा सटीक गणना कर सकें। मुख्यतः यह ग्रंथ महर्षि भृगु और उनके पुत्र दैत्यगुरु शुक्राचार्य के बीच हुए वार्तालाप पर आधारित है। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी, आज हम हिन्दुबुक के पन्नो से आपके लिए लेकर आए है महर्षि भृगु से जुड़ी हुई एक अनोखी कथा जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते है।

पद्मपुराण में वर्णित इस कथा के अनुसार, एक बार मन्दराचल पर्वत पर आर्यावर्त के अनेक ऋषि मुनियों का जमावड़ा हुआ था। वे सब वहाँ एक बहुत बड़े यज्ञ के आयोजन के उद्देश्य से एकत्र हुए थे। वहीँ उन ऋषियों में आपस मे शास्त्रार्थ होने लगा कि त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से सबसे श्रेष्ठ देव कौन है। अंत मे यह निष्कर्ष निकाला गया कि तीनों में से जिस भी देव के व्यवहार में सतोगुण की मात्रा अधिक रहेगी, वही देव सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा। अब चर्चा इस बात पर होने लगी कि यह कैसे पता लगाया जाए कि किस देव में सत्वगुण अधिक है। इसके समाधान के लिए सभी ऋषि मुनि “महर्षि भृगु” के पास गए और उनसे तीनो देवो की परीक्षा लेने का आग्रह करने लगे। महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए तैयार हो गए।

परीक्षा लेने के क्रम में सबसे पहले वे ब्रह्मलोक में अपने पिता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। जाते ही उन्होंने बिना कारण ही ब्रह्मा जी को भला बुरा कहना शुरू कर दिया। ब्रह्मा जी क्रोधित होकर कहने लगे- “भृगु! तुम कितने ही बड़े विद्वान क्यो न हो जाओ, मत भूलो मैं तुम्हारा पिता हूँ। तुम्हे मेरा आदर करना चाहिए”। अब महर्षि भृगु जी ने हाथ जोड़ कर कहा कि- “हे परमपिता ब्रह्मदेव! मैं तो केवल आपकी परीक्षा लेने आया था। ब्रह्मा जी को परीक्षा का प्रयोजन बता कर और उन्हें प्रणाम कर अब महर्षि भृगु कैलाश पर्वत पहुंचे। महर्षि भृगु ने भगवान शिव को भी भला बुरा कहना शुरू कर दिया। अब महादेव तो है ही रुद्र! उन्हें भी भृगु जी पर क्रोध आ ही गया। महर्षि ने उन्हें भी परीक्षा लेने वाली बात बताई और उन्हें दण्डवत कर क्षीरसागर में भगवान विष्णु के पास पहुँचे।

क्षीरसागर पहुंच कर महर्षि भृगु ने देखा कि भगवान विष्णु आँखे बंद कर निद्रा अवस्था मे है। देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थी। महर्षि भृगु ने आव देखा न ताव, भगवान विष्णु के नजदीक पहुंच कर अपने पैरों से उनके छाती पर प्रहार कर दिया। भगवान विष्णु निद्रावस्था से बाहर आए, देखा तो सामने महर्षि भृगु खड़े है। उन्होंने महर्षि के पैर अपने हाथों में लेकर कहा- “हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरा वक्षस्थल कुछ कठोर है, कहीँ आपके नाजुक और सुकोमल चरणों मे कोई चोट तो नही आई”।

इतना सुनकर महर्षि भृगु को अपनी इस हरकत पर बड़ा पछतावा हुआ लेकिन साथ ही उन्हें प्रसन्नता भी हुई। उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम कर अपने कृत्य की क्षमा मांगी और साथ ही अपने इस कृत्य का प्रयोजन भी बताया की उन्होंने परीक्षा लेने के लिए ही ऐसा किया था। उन्होंने भगवान विष्णु को त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। किन्तु महर्षि की यह हरकत देवी लक्ष्मी को पसन्द नही आई। अपने स्वामी पर हुए पादप्रहार से विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी क्षुब्ध हो गई और उन्होंने महर्षि भृगु से श्राप देते हुए कहा- “आज से मैं ब्राह्मणों के पास नही रहूँगी, एवं ब्राह्मण सदैव दरिद्र ही रहेंगे, भिक्षाटन कर अपना व परिवार का जीवन निर्वाह करेंगे”। तब महर्षि ने देवी लक्ष्मी से भी क्षमायाचना की। तब तक लक्ष्मी जी का क्रोध भी शान्त हो चुका था, उन्होंने महर्षि भृगु से कहा- “जो ब्राह्मण जगतपालक श्रीहरि विष्णु जी की आराधना करेगा उनपर मेरा यह श्राप फलित नही होगा”।

त्रिदेवों की इस परीक्षा में समस्त मनुष्य जाति के लिए एक बहुत बड़ी सीख छिपी हुई है। और वह सीख यह है कि परिस्थितिया चाहे कितनी भी विपरीत क्यो न हो, हमे बिना विचलित हुए शान्त भाव से उनका समाधान खोजना चाहिए। इस घटना के परिपेक्ष्य से ही समाज मे इस लोकोक्ति का भी जन्म हुआ:

“क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात
का विष्णु का घट गया, जो भृगु ने मारी लात”

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