ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियों जैसे क्यों थे भगवान परशुराम, क्या है भगवान परशुराम के जन्म का रहस्य

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ब्राह्मण स्वभाव से ही शांतचित्त और संतोषी पृवत्ति का होता है। वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ब्राह्मणों को समाज को शिक्षित और जागृत करने का कार्य दिया गया था। वे शास्त्र शिक्षा के साथ साथ शस्त्र शिक्षा भी देते थे। लेकिन वे स्वयं कभी शस्त्र धारण नही करते थे, क्योकि ये कार्य तो क्षत्रियों का था। फिर ऐसा क्या हुआ कि भगवान परशुराम जी स्वभाव से भी क्रोधी थे और उन्होंने न केवल शस्त्र धारण किए बल्कि 21 बार इस पृथ्वी को आतताई एवं समाज को कष्ट देने वाले दुष्ट क्षत्रियों का संहार कर पृथ्वी को शुद्ध किया। इसके पीछे उनके जन्म से जुड़ा हुआ एक रहस्य छिपा हुआ है जिसके बारे में आज हम आपको बताएंगे।

ये समय था सतयुग और त्रेतायुग के संधिकाल का। अर्थात सतयुग समाप्त होने की ओर अग्रसर था और त्रेतायुग शुरू होने वाला था। कन्नौज नगरी में गाधि नामके एक क्षत्रिय राजा राज्य करते थे। उनके ‘सत्यवती’ नामकी एक गुणवान कन्या थी, जिसका विवाह महर्षि भृगु के पुत्र ‘ऋचीक’ ऋषि के साथ हुआ था। एक बार महर्षि भृगु अपने पुत्र के आश्रम पधारे। ऋचिक मुनि ने अपनी पत्नी सत्यवती सहित उनका बड़ा आदर सत्कार किया। महर्षि भृगु इस आदर सत्कार से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सत्यवती से वरदान मांगने के लिए कहा। देवी सत्यवती ने अपने श्वसुर को प्रसन्न जानकर उनसे अपनी माता के लिए उत्तम गुणों से युक्त एक तेजस्वी पुत्र की प्रार्थना की। महर्षि भृगु इस बात से बड़े प्रभावित हुए की इसने अपने लिए कुछ भी न मांगकर अपनी माता के लिए मांगा। महर्षि ने अपनी पुत्रवधु से कहा की मैं तुम दोनों माँ-बेटी को ही उत्तम गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त होने का वरदान देता हूँ। इतना कहकर महर्षि ने अपने योगबल से दो फल प्रकट किए, और उन्हें सत्यवती को देते हुए कहा कि जब तुम दोनों ऋतुस्नान कर चुकी हो तब ये वाला फल अपनी माता को खिला देना और ये दूसरा फल तुम स्वयं ग्रहण करना किन्तु ध्यान रहे जो फल मैंने तुम्हारी माता के लिए दिया है वो फल अपनी माता को ही देना और जो फल मैंने तुम्हारे लिए दिया है वो फल तुम स्वयं ग्रहण करना। अब इसके पीछे एक कारण यह था कि महर्षि भृगु जानते थे कि सत्यवती के माता पिता क्षत्रिय है इसीलिए उन्होंने उस फल में क्षत्रियों के श्रेष्ठ गुण समाहित किए थे जबकि सत्यवती वाले फल में ब्राह्मणों वाले गुण समाहित थे। लेकिन जब फ़ल खाने की बारी आई तो सत्यवती की माता के मन मे संशय उत्पन्न हुआ कि अवश्य ही महर्षि ने सत्यवती वाले फल में कुछ विशिष्ट और दिव्य गुण समाहित किए होंगे जो मेरे फल में नही होंगे ताकि सत्यवती का पुत्र मेरे पुत्र से ज्यादा कीर्तिमान और यशस्वी हो। इसी संदेह के चलते सत्यवती की माता ने दोनो फल अदली बदली कर दिए। उन्होंने अपना फल तो अपनी पुत्री सत्यवती को खिला दिया और अपनी पुत्री वाला फल स्वयं खा गई। महर्षि भृगु ने अपने तपोबल से इस बात को जान लिया था और उन्होंने सत्यवती को सारी बात बता कर कहा कि अब तुम्हारा जो पुत्र होगा वह ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय गुणों वाला होगा और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण गुणों ये युक्त होगा। सत्यवती ने अपने श्वसुर महर्षि भृगु से विनती की की आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मेरा पुत्र तो ब्राह्मण गुणों से युक्त ही रहे और ब्राह्मणों की तरह ही आचरण करे, भले ही फिर मेरा पौत्र क्षत्रिय गुणों वाला हो जाए। महर्षि ने उसकी विनती स्वीकार कर ली। कालांतर में सत्यवती के यहाँ “जमदग्नि” ने जन्म लिया और सत्यवती की माता के घर “विश्वामित्र” का जन्म हुआ जो वर्ण से क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणों जैसे आचरण करते रहे और अपनी तपस्या के बलपर “महर्षि” की पदवी को धारण किए। सत्यवती के पुत्र ऋषि ‘जमदग्नि’ अत्यंत तेजस्वी और तेजवान थे। उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। देवी रेणुका के यहाँ “परशुराम” सहित 5 पुत्रों ने जन्म लिया।

महर्षि भृगु के वरदान स्वरूप परशुराम जी मे जन्म से ही क्षत्रियों वाले गुण थे। वे भगवान श्री हरि विष्णु के ‘छठवें’ अवतार थे। भगवान परशुरामजी को विष्णु जी का “आवेशावतार” भी माना जाता है, इसीलिए भी बाल्यकाल से ही वे क्रोधी स्वभाव के थे। वे अपने माता पिता के बड़े भक्त थे। एक बार आवेश में आकर ऋषि जमदग्नि जी ने अपने पुत्रों को अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी। चारो पुत्रो ने तो अपने पिता की आज्ञा मानने से मना कर दिया किन्तु भगवान परशुराम जी ने अपने पिता की आज्ञा मानते हुए अपने फरसे से अपनी माँ और अपने भाइयों का गला काट दिया था। परशुरामजी की पितृभक्ति को देखकर जमदग्नि जी ने परशुरामजी से वर मांगने के लिए कहा, तब परशुरामजी ने अपने पिता से अपनी माँ और अपने भाइयों को पुनः जीवित कर देने को कहा साथ ही यह विनती भी की की उनकी माता और उनके भाइयों को इस घटना का स्मरण न रहें। जमदग्नि जी इस बात से बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पत्नी और अपने पुत्रों को फिर से जीवित कर दिया साथ ही उनकी स्मृति से इस घटना का हमेशा के लिए विस्मरण कर दिया।

परशुरामजी ने शस्त्र क्यो धारण किए और क्या है 21 बार क्षत्रियों के विनाश का रहस्य:
एक बार परशुरामजी कही बाहर गए हुए थे। उसी समय महिष्मति राज्य के राजा हैहय वंशीय कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सेना सहित मार्ग भटक कर जमदग्नि जी के आश्रम पहुँचे। कार्तवीर्य अर्जुन को एक हज़ार भुजाओं का वरदान मिला था इसीलिए उसे सहस्त्रार्जुन भी कहते है। ऋषि जमदग्नि ने चमत्कारी ‘कामधेनु’ गाय की सहायता से सहस्त्रार्जुन की उसकी सेना सहित आवभगत की। यह चमत्कार देखकर सहस्त्रार्जुन के मन मे लोभ उत्पन्न हुआ और वो कामधेनु को चोरी करके ले गया। परशुरामजी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने महिष्मति राज्य पर अकेले ही हमला कर दिया। सहस्त्रार्जुन की हज़ार भुजाओं को अपने फरसे से काट काट कर अलग कर दिया और सहस्त्रार्जुन का वध कर, कामधेनु को वापिस आश्रम ले आए।

सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए परशुरामजी की अनुपस्थिति में जमदग्नि मुनि को उस वक्त मार दिया जब वे ध्यान में बैठे हुए थे। परशुरामजी की माता रेणुका अपने पति अपने पति की चिताग्नि में प्रविष्ट होकर उनके साथ ही सती हो गई। इस घटना के बाद परशुरामजी के अंदर का क्रोध जाग उठा। उन्होंने विचार किया कि जब ये दुष्ट और निरंकुश हो चुके क्षत्रिय राजा मेरे पिता के साथ इस तरह का व्यवहार कर सकते है तो आम जनता पर कितना अत्याचार करते होंगे।और उन्होंने निरंकुश एवं आताताई राजाओं से प्रजा को मुक्त करने का वचन लिया। इसके बाद उन्होंने 21 बार इस धरती को हैहयवंशी दुष्ट और निरंकुश एवं अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं का वध कर पृथ्वी के बोझ को हल्का किया। उन्होंने केवल अपने पिता का बदला लेने के लिए शस्त्र धारण नही किए थे, अपितु सम्पूर्ण मानव जाति को अत्याचारी राजाओं के अत्याचारों से बचाने के लिए और प्रजा को सुख देने के उद्देश्य से शस्त्र धारण किए थे। और ये बात भी मिथ्या ही है कि उन्होंने 21 बार सभी क्षत्रियों का सम्पूर्ण विनाश कर दिया था, अगर ऐसा होता तो पहली बार क्षत्रियों का संहार करने के बाद दुबारा क्षत्रिय कैसे उत्पन्न हो गए। उन्होंने केवल उन्ही क्षत्रिय राजाओं का संहार किया जो अपने राजधर्म से विमुख हो गए थे, सत्ता के मद में चूर होकर आम जनता पर बेहिसाब अत्याचार करते थे।

21 बार दुष्ट क्षत्रियों का संहार करने के बाद महर्षि ऋचीक ने उन्हें समझाया और शस्त्र त्याग देने की विनती की। इसके बाद भगवान परशुरामजी ने अश्वमेध यज्ञ किया और सम्पूर्ण पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। इंद्र के सामने उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और स्वयं महेन्द्रगिरि पर्वत पर तपस्या करने चले गए। भगवान परशुरामजी अष्टचिरंजीवियो में से एक है और वो कलयुग के अंत तक इस पृथ्वी पर रहेंगे। कल्कि पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु कलयुग में कल्कि अवतार में प्रकट होंगे तब भगवान परशुरामजी ही उनके गुरु होंगे, और उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देंगे।

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